दुनिया बदली, पर बरकरार है
सिलविया अयूसो
हवाना, 2 जनवरी(आईएएनएस)। पिछले 50 वर्षो में दुनिया कई राजनीतिक प्रणालियों के ध्वस्त होने, युद्घों और हमलों को अंजाम दिए जाने, अंतर्राष्ट्रीय व क्षेत्रीय गठबंधनों के तार-तार होने का गवाह रही है, लेकिन क्यूबा की क्रांति का मिजाज नहीं बदला है।
समाचार एजेंसी डीपीए के मुताबिक क्यूबाई क्रांति की विरासत आज भी बरकरार है। ऐतिहासिक बदलावों के कई दौरों के बावूजद अगर किसी देश का राजनीतिक स्वरूप अपनी मौलिकता के साथ बरकरार है तो वह है क्यूबा। 1 जनवरी, 1959 को क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने तब के तानाशाह फूलजेनसियो बतिस्ता के खिलाफ क्रांति की जीत का ऐलान कर दिया था। बतिस्ता अमेरिका भाग गए और कास्त्रो के हाथों में सत्ता की बागडोर आई।
सैनिक पोशाक पहने कास्त्रो ने जब हवाना में क्रांतिकारियों के साथ प्रवेश
किया तो क्रांति की ज्वाला से अमेरिका जैसा ताकतवर देश भी डरने लगा। इस कामयाबी के दो साल बाद देश को समाजवादी स्वरूप वाला घोषित किया गया। तब कास्त्रो ने कहा था, "यह दबे कुचले लोगों की समाजवादी और लोकतांत्रिक क्रांति है।"
उन्होंने अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए सोवियत संघ को अपने मुल्क में एटमी मिसाइल तैनात करने की छूट दी। अपने खिलाफ क्यूबा के कड़े रुख से खफा होकर 1962 में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी ने क्यूबा पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए जो आज भी जारी हैं और क्यूबा को अब तक इसके कारण 100 अरब रुपए से अधिक का नुकसान हो चुका है।
इधर देश में समाजवादी क्रांति के नाम पर बदलाव की हवा रोकी गई। दशकों से देश में यथास्थिति बनी हुई है। 31 जुलाई, 2006 को कास्त्रो ने अपने भाई राउल कास्त्रो को सत्ता सौंपी। राउल ने कुछ बदलाव किए। लग्जरी होटलों में लोगों के ठहरने पर लगा प्रतिबंध हटाया गया है, वहीं मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने की छूट दी गई। लेकिन आज भी कई मसले अनसुलझे हैं। यात्राओें पर कई तरह के प्रतिबंध जारी हैं, वहीं दोहरी मुद्रा का मामला भी बरकरार है। क्यूबा से अमेरिका की ओर लोगों के पलायन का सिलसिला पहले की तरह ही जारी है। राउल ने स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया चाहे जितनी बदल जाए क्यूबा का मौलिक समाजवादी चरित्र बरकरार रहेगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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