पशुपतिनाथ मंदिर विवाद : भारत-नेपाल रिश्तों में खाई न पैदा कर दे
काठमांडू, 1 जनवरी (आईएएनएस)। नेपाल में हिंदुओं की आस्था का केंद्र कहे जाने वाले पशुपतिनाथ मंदिर से तीन भारतीय पुजारियों को हटाए जाने का मामला अब तूल पकड़ने लगा है। विवाद इतना गहराता जा रहा है कि मंदिर के एक पूर्व अधिकारी ने चेतावनी दे डाली है कि इस विवाद के चलते नेपाल और भारत के संबंध भी बिगड़ सकता है।
17वीं शताब्दी के इस मंदिर के अधिकारी रहे नरोत्तम वैद्य ने एक निजी टेलीविजन चैनल से बातचीत में कहा कि बेवजह तीन पुजारियों को हटाए जाने का असर भारत में कार्यरत नेपालियों पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि इन पुजारियों को दक्षिण भारत से इसलिए लाया गया था ताकि वे रीति रिवाज से यहां पूजा करा सकें।
उन्होंने कहा कि नेपाल में यदि एक भारतीय को थप्पड़ पड़ता है तो इसका असर भारत के सिर्फ मेघालय राज्य में ही 100 नेपालियों पर पड़ता है। उन्होंने नेपाल की माओवादी सरकार पर धर्म के नाम पर राजनीति करने का आरोप भी लगाया।
ज्ञात हो कि नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र के सत्ता से बेदखल होने के सात महीने बाद ही बदलाव की हवा नेपाल के संरक्षक भगवान पशुपतिनाथ तक भी पहुंच गई थी।
काठमांडू घाटी में स्थित यह मंदिर हिंदुओं के आठ सबसे पवित्र मंदिरों में से एक है। 17वीं शताब्दी का यह मंदिर एक वैश्विक धरोहर है। प्रति वर्ष हजारों पर्यटक व दर्शनार्थी दर्शन-पूजन के लिए यहां आते हैं।
उल्लेखनीय है कि नई माओवादी सरकार ने इस हफ्ते लगभग 300 वर्ष पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए मंदिर में मूर्तियों की पूजा के लिए नेपाली पुजारियों की नियुक्ति का निर्णय किया।
वर्ष 1804 से ही मंदिर में दक्षिण भारतीय पुजारियों की नियुक्ति की परंपरा रही है। दक्षिण भारतीय पुजारी अपनी रूढ़िवादिता व कर्मकांड के बारे में ज्ञान के लिए जाने जाते हैं।
लेकिन लोकतंत्र समर्थक एक आंदोलन के बाद दुनिया के इस एकमात्र हिंदू राष्ट्र के एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र के रूप में रूपांतरित होने के साथ ही इस वर्ष समाज के कई तबकों से यह मांग उठने लगी कि पशुपतिनाथ की पुरानी परंपरा को समाप्त कर वहां नेपाली पुजारियों की नियुक्ति की जाए।
दबाव के आगे झुकते हुए मंदिर के तीन भारतीय पुजारियों ने इस महीने अपना इस्तीफा सरकार को सौंप दिया। रविवार को दो नेपाली पुजारियों की नियुक्ति भी कर दी गई।
जहां भारतीय पुजारी जनता के फैसले को स्वीकार करने को सहर्ष तैयार हैं, वहीं उनके सहयोगी इस फैसले के सख्त खिलाफ हैं।
पुजारियों को पूजा-पाठ में सहयोग करने वाले लगभग 100 नेपाली राजभंडारियों ने इस निर्णय के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी है। वे सदियों पुरानी परंपरा को तोड़े जाने के खिलाफ हैं।
राजभंडारियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू करने व जरूरत पड़ने पर नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की चेतावनी दी है।
विरोधियों को नेपाल की मुख्य विपक्षी पार्टी, गिरिजा प्रसाद कोईराला की नेपाली कांग्रेस (एनसी) से अप्रत्याशित समर्थन प्राप्त हुआ है।
नेपाली कांग्रेस के मुख्य सचेतक लक्ष्मण घिमिरे ने इस मामले को सोमवार को संविधान सभा में उठाया। घिमिरे ने कहा कि इस तरह का कोई महत्वपूर्ण निर्णय सिर्फ मंत्रिमंडल द्वारा ही लिया जा सकता है।
घिमिरे ने कहा कि उनकी पार्टी इस निर्णय का इसलिए विरोध करती है, क्योंकि नई नियुक्ति के लिए सरकार ने उपयुक्त प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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