महँगाई, आर्थिक संकट और बांग्लादेश चुनाव

यहाँ के सबसे बड़े कपड़ा उद्योग पर आर्थिक संकट का असर कहीं अधिक है.
बांग्लादेश में ऐसी टैक्सटाईल फ़ैक्ट्रियों की बहुत बड़ी संख्या है जहां विदेशी कंपनियों के लिए आर्डर पर काम किया जाता है.
ये यहाँ का सबसे बड़ा उद्योग है और हालत ये है कि इस उद्योग को भी आर्थिक संकट की मार झेलनी पड़ रही है.
बांग्लादेश के कुल निर्यात का 75 प्रतिशत हिस्सा कपड़ा उद्योग से आता है.
ये उद्योग यहां के लगभग 45 लाख लोगों को रोज़गार देता है. मौजूदा आर्थिक संकट का असर इन 45 लाख लोगों पर सीधे सीधे पड़ रहा है.
बागंलादेश के कुल निर्यात का 75 प्रतिशत हिस्सा कपड़ा उद्योग से आता है. और ये उद्योग यहां के लगभग 45 लाख लोगों को रोज़गार देता है. मौजूदा आर्थिक संकट का सीधा असर इन 45 लाख लोगों पर सीधे सीधे पड़ रहा है.
| |
टैक्सटाइल कंपनियों को विदेशों से मिले ऑर्डर से ही देश के सकल घरेलू उत्पाद को 10.5 प्रतिशत हिस्सेदारी मिली है. ज़ाहिर है आर्थिक संकट का असर इस पर भी हो रहा है.
अजय यहां की एक प्रमुख टैक्सटाईल कंपनी में मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं.
उन्होंने बताया, "बांग्लादेश में आर्थिक संकट का असर दिखने लगा है ख़ासतौर से टैक्सटाइल उद्योग पर."
वो बताते हैं, "काम कम हो गया है जिससे कई छोटी कंपनियों पर काम नहीं है. बड़ी कंपनियां इसलिए टिकी हुई हैं क्योंकि उनके पास योजना है और लंबे ऑर्डर हैं इसलिए उनके टिके रहने की संभावना है."
छोटी कंपनियां बड़ी कंपनियों से काम लेती थीं लेकिन अब काम उतना नहीं है तो छोटी कंपनियों पर असर पड़ना लाज़मी है.
आम नागिरक पर असर
लेकिन बांग्लादेश में केवल टैक्सटाईल उद्योग अकेले ही आर्थिक संकट की मार नहीं झेल रहा है.
यहाँ का आम नागरिक बढ़ती मँहगाई से त्रस्त है. कहते हैं महँगाई की मार का सबसे पहले असर पेट पर ही पड़ता है.
दिनभर रिक्शा चलाकर 150 टका कमाते हैं जिससे आम ज़रूरते भी पूरी नहीं होती. पहले जो चावल 10 टका में मिलता था ये अब 35 टका का है. हम परिवर्तन के लिए वोट देंगे एक रिक्शा चालक
| |
पूर्णिमा घर में काम करने वाली एक महिला है और घर की ज़िम्मेदीरी उस पर ज़्यादा है. वो गर्भवती है और महँगाई के डर से अपने होने वाले बच्चे की सही देखभाल न होने के डर से गर्भपात कराना चाहती है.
एक रिक्शा चालक से जब वोट देने के बारे में पूछा तो उसने कहा कहा, " दिनभर रिक्शा चलाकर 150 टका कमाते हैं जिससे आम ज़रूरतें भी पूरी नहीं होतीं. पहले जो चावल 10 टका में मिलता था ये अब 35 टका का है. हम परिवर्तन के लिए वोट करेंगे."
सब्ज़ी बाज़ार में दुकाने ज़्यादा है और ख़रीदार कम. ख़रीदारी करने आए एक सरकारी कर्मचारी ने बताया, "इस महँगाई में ख़र्च चलाना मुश्किल हो गया है."
सब्ज़ी बेचने वालों का कहना है कि नेता वादा चाहे जो भी करें असल में वो कुछ भी नहीं करते हैं. आर्थिक मंदी की मार तो हम झेल रहे हैं. हमारी हालत तो ऐसी है कि ‘आमदनी अठन्नी और ख़र्चा रूपय्या.’
यानी यहां के नेता ख़ुशहाल बांग्लादेश लाने के सपने ज़रूर दिखा रहे हैं लेकिन बेरोज़गारी, हड़तालों और विश्व में छाए आर्थिक संकट की मार से यहां का आम आदमी कम से कम ख़ुशहाली के सपने नहीं देख पा रहा है.












Click it and Unblock the Notifications