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एक रेस्तरां यह भी था

By Staff
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एक रेस्तरां यह भी था

इसी रेस्तरां के ठीक सामने दो चरमपंथियों ने 26 नवंबर की रात अंधाधुंध गोलियां चलाकर कम से कम साठ लोगों को मार दिया था.

शायद उनका इरादा रेस्तरां में बैठे लोगों को भी मारने का था जिसके गवाह रेस्तरां मालिक और गोलियों के वो निशान हैं जो रेस्तरां की कांच की दीवारों पर अब भी हैं.

रेस्तरां के मालिक प्रमोद गुप्ता उस रात रेस्तरां में ही थे. वो इस सदमे से उबर चुके हैं लेकिन अभी भी उनके रेस्तरां के कांचों में गोलियों के दाग मौजूद हैं.

वो बताते हैं, ‘‘ 17 गोलियां मारी गई थीं रेस्तरां पर. लेकिन किस्मत थी कि यहां का कोई भी ग्राहक नहीं मारा गया. जब गोलियां चलने लगीं तो हमने लाइट ऑफ़ कर दी और लेट गए. दो लोग थे जो ताबड़तोड़ गोलियां चला रहे थे. एक तो वही था जो पकड़ा गया है. ’’

अब महीने भर बाद भी उन्होंने रेस्तरां के कांच क्यों नहीं बदले हैं? वो कहते हैं, ‘‘ अब धीरे धीरे बदल रहे हैं. पैसा लगता है इसमें. नीचे का हमने बदल दिया है ऊपर बाद में बदलेंगे. लोग आते हैं. फोटो खींचते हैं और उस दुखद घटना को याद करते हैं.’’

ये कैसी बेरुख़ी

हमले के बाद आडवाणी जी आए थे लेकिन वो इधर नहीं आए. गेट से ही चले गए. जबकि इस रेस्तरां के सामने साठ लोग कम से कम मारे गए होंगे. सुबह में ही सब साफ सफाई कर दिया गया. हमारे रेस्तरां का इतना नुकसान हुआ. कोई पैसा नहीं मिला हमें. हम अपने पैसे से रेस्तरां का रिपेयर करा रहे हैं प्रमोद गुप्ता

हमले के बाद आडवाणी जी आए थे लेकिन वो इधर नहीं आए. गेट से ही चले गए. जबकि इस रेस्तरां के सामने साठ लोग कम से कम मारे गए होंगे. सुबह में ही सब साफ सफाई कर दिया गया. हमारे रेस्तरां का इतना नुकसान हुआ. कोई पैसा नहीं मिला हमें. हम अपने पैसे से रेस्तरां का रिपेयर करा रहे हैं

प्रमोद सरकार से भी ख़ासे नाराज़ हैं और वो साफ़ कहते हैं कि सरकार का ध्यान छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर बिल्कुल नहीं था.

वो कहते हैं, ‘‘ हमले के बाद आडवाणी जी आए थे लेकिन वो इधर नहीं आए. गेट से ही चले गए. जबकि इस रेस्तरां के सामने साठ लोग कम से कम मारे गए होंगे. सुबह में ही सब साफ सफाई कर दिया गया. हमारे रेस्तरां का इतना नुकसान हुआ. कोई पैसा नहीं मिला हमें. हम अपने पैसे से रेस्तरां का रिपेयर करा रहे हैं. ’’

नुकसान तो जो हुआ जो हुआ, अब ग्राहक भी कम हो गए हैं. प्रमोद बताते हैं कि लोग अभी भी डरे हुए हैं और अब कोई भी स्टेशन पर समय से पहले नहीं आता.

वो कहते है, ‘‘ पहले तो लोग हमारे यहां घंटों आकर बैठते थे. गप लड़ाते थे. अब आप देख ही रहे हैं कितना खाली है. अब लोग समय पर ही स्टेशन आते हैं.’’

वो कहते हैं कि लोगों की कमी के कारण धंधा कम हो गया है. उनके शब्दों में धंधा तो बस चार आने ही रह गया है.

प्रमोद को नुकसान की चिंता नहीं है लेकिन उनका गुस्सा सरकार से है कि सरकार ने छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर मारे गए लोगों को वो महत्व नहीं दिया जितना ताज और ओबेराय के लोगों को दिया गया.

रिफ्रेश रेस्तरां छोटा सा है और यहां ताज पैलेस और ओबेरॉय में जाने वाले धनी लोग नहीं आते और पहली नज़र में देखकर लगता है कि इस पर सरकार का ध्यान नहीं जाने का यही कारण भी है.

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