समाचार माध्यमों में मानवीय सरोकारों वाली खबरों का अभाव !
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर (आईएएनएस)। वरिष्ठ पत्रकारों व मीडिया संस्थानों से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि अपवादों को छोड़ दिया जाए तो समाचार माध्यमों में दिनोंदिन मानवीय सरोकारों वाली खबरों का अभाव होता जा रहा है तथा त्रासदीपूर्ण समाचारों का भी बाजारीकरण किया जा रहा है।
नई दिल्ली के इंडिया हेबीटेट सेंटर में सोमवार को 'प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया'(पीआईआई) और 'इंटरनेशनल कमेटी ऑफ दे रेड क्रॉस' (आईसीआरसी) की ओर से आयोजित गोष्ठी में चेन्नई स्थित 'एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म' के प्रमुख शशि कुमार ने कहा कि किसी खबर को मानवीय रूप देना आत्म परीक्षण करने जैसा है। आज उड़ीसा में जो कुछ हो रहा है, मीडिया को उसे पूरी जिम्मेदारी के साथ सामने लाना चाहिए लेकिन कुछ मीडिया संगठन खबरों को दूसरे तरीके से प्रस्तुत कर रहे हैं।
कुमार ने कहा, "आज मीडिया संगठनों में कई जगहों पर 'फील गुड' का माहौल है। वे केवल लाभ अर्जित करना नहीं चाहते, बल्कि उसके चरम पर पहुंचना चाहते हैं। इस दौर में मीडिया संगठनों की बजाय कई ब्लॉगर्स काफी अच्छा काम कर रहे हैं।"
'तहलका' पत्रिका की समाचार-संपादक हरिंदर बवेजा ने गोधरा कांड व उसके बाद की घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि इन घटनाओं से जुड़ी कई ऐसी खबरे आईं हैं, जिसे छुपाने की कोशिश होती रही थी। इसलिए पूरी तरह निराश होने की जरूरत नहीं है।
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे 'द हिंदू' के राजनीतिक संपादक हरीश खरे ने कहा, "सभी मीडिया संगठनों के अपने मानदंड हैं और हर अखबार अपने संपादक का प्रतिबिंब होता है। आज जरूरत है अपने काम के प्रति अधिक जिम्मेदार, संवेदनशील और ईमानदार होने की ।"
इस मौके पर पीआईआई और आईसीआरसी की ओर से मानवीय सरोकारों से जुड़े लेखों के लिए 'मलयालम मनोरमा' के सह-संपादक टी. अजीश को प्रथम पुरस्कार दिया गया, जबकि 'तहलका' के रघु कर्नाड और 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के संवाददाता मोहम्मद वजाजुद्दीन को क्रमश: दूसरा और तीसरा पुरस्कार दिया गया।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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