हिंदू त्योहारों की तैयारी में जुटे हैं वाराणसी के मुसलमान भी

वाराणसी, 6 अक्टूबर (आईएएनएस)। देश की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली काशी की तंग गलियों में आज भी सांप्रदायिक सौहाद्र्र की गंगा हिलोरे मार रही है और यहां हिंदूओं व मुसलमानों के बीच किसी प्रकार का भेदभाव दिखाई नहीं देता।

जियाउद्दीन अंसारी का पूरा परिवार कई पीढ़ियों से हिन्दू देवी देवताओं के लिए न सिर्फ मुकुट बनाता है बल्कि प्रत्येक देवता के हिसाब से वह डिजाइन भी तैयार करता है। आज जियाउद्दीन का बनाया मुकुट ही जन्माष्टमी के अवसर पर श्रीकृष्ण को, रामनवमी के समय श्रीराम को और नवरात्रि के समय दुर्गा के सिर पर शोभायमान होता है।

जियाउद्दीन मियां नवरात्रि की तैयारी छह महीने पहले से ही शुरूकर देते हैं। क्योंकि, यदि वे समय से दुर्गा के सिर पर सजने वाला मुकुट तैयार नहीं करेंगे तो दुर्गा पूजा का पर्व अधूरा रह जाएगा।

जियाउद्दीन मियां बताते हैं कि बनारसी साड़ी के कारोबारियों के सामने इस समय संकट की स्थिति है लेकिन इस मुकुट के व्यवसाय में हमेशा काम मिलता रहता है। राम नवमी पर राम के लिए, कृष्ण जन्माष्टमी पर कृष्ण के लिए, दुर्गापूजा पर दुर्गा के लिए आभूषण तो तैयार किए ही जाते हैं साथ ही सरस्वती पूजा, विश्वकर्मा पूजा तथा रामलीला और कृष्ण लीला के लिए भी काम मिलते हैं।

देवी देवताओं के आभूषण बनाकर परिवार का भरण पोषण करने वाला जियाउद्दीन का परिवार अकेला नहीं है। वाराणसी के कोयला बाजार, लल्लापुरा और बड़ी बाजार के सैकड़ों परिवार हैं जो इस व्यवसाय को रोजी रोटी का जरिया बनाये हुए हैं। 500 रुपये से शुरू होकर 50 हजार रुपये तक के तैयार होने वाले मुकुट देवी-देवता के हिसाब से बनाए जाते हैं।

जियाउद्दीन अंसारी बताते हैं कि चाहे दुर्गा हों, राम हों या फिर कृष्ण हों, जितने करीब से एक कलाकार उन्हें महसूस करता है उतने करीब से उनको पूजने वाले नहीं। उन्होंने कहा कि यह अलग बात है कि उनके धर्म में बुत परस्ती की मनाहीं है लेकिन मुकुट बनाते समय जेहन में उस देवता की पूरी तस्वीर होती है। किसी प्रकार के भेदभाव के सवाल पर अंसारी बताते हैं कि वाराणसी ही ऐसा शहर है जहां मस्जिद में अजान और मंदिर में आरती साथ-साथ होती है।

गौरतलब है कि वाराणसी में बनने वाले मुकुट और अन्य आभूषणों के कारोबार ज्यादातर दक्षिण भारत के साथ होते हैं। वाराणसी में पीढ़ियों से मुकुट के थोक विक्रेता रहे केशव प्रसाद महेन्द्र ने बताया कि वैसे तो वाराणसी में बने मुकुट और आभूषण पूरे देश में जाते हैं लेकिन दक्षिण भारत, मथुरा, वृन्दावन और बंगाल में इसकी खपत ज्यादा होती है। इसी कारोबार से जुड़े गोपीनाथ महेन्द्र बताते हैं कि जिस तरह वे मुकुट के पुश्तैनी कारोबारी हैं उसी तरह इसे बनाने वाले मुसलमान भी पुश्तैनी हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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