भोलेनाथ पर भारी घाघ

नई दिल्ली, 10 जून (आईएएनएस)। सत्ता की दुनिया में मोटे तौर पर दो तरह के लोग होते हैं। एक, वे जिनके लिए सिर्फ अंत या साध्य महत्वपूर्ण होता है और दूसरे वे, जिनके लिए साध्य के साथ-साथ साधन भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। इसे सरल शब्दों में समझाने के लिए चलिए हम इन्हें नाम दे देते हैं। पहले तरह के लोगों को घाघ कहें और दूसरी तरह के लोगों को कहें भोलेनाथ। सत्ता के इस संघर्ष में कभी-कभी भोलेनाथ जीत जाता है, लेकिन अधिकतर मौकों पर जीत घात की ही होती है।

घाघ का खाका:

घाघ में महत्वाकांक्षाएं तो बहुत होती हैं, लेकिन अंतरात्मा बहुत कम। वह नैतिक दबावों से पूरी तरह आजाद होता है। वह उन सारी चीजों को करने के लिए स्वतंत्र है, जिसमें उसे खुशी मिलती है या जिनसे उनका स्वार्थ सिद्ध होता है। उसकी ऐसी कोई लोक छवि नहीं होती, जिसकी उसे चिंता करनी पड़े।

हर वक्त उसका सारा ध्यान अपने लक्ष्य की प्राप्ति की तरफ होता है। वह सिर्फ अपनी महत्वाकांक्षाओं के प्रति ही वफादार होता है। उसे इस चीज की परवाह नहीं होती कि अपने उद्देश्यों को पाने की ललक के चलते अपने ही समुदाय की नजरों में उसकी कैसी छवि बन रही है। वह न तो संवेदनशील या दयालु है और न ही उसके लिए जीवन पिकनिक है। उसके लिए जीवन चाटुकारिता है, षडयंत्र है और संघर्ष है। वह अक्सर शक्तिशाली लोगों की खुशामद में लगा रहता है, लेकिन जो लोग उसकी योजनाओं के लिए गैर जरूरी होते हैं, उनके प्रति उसका रवैया उदासीन रहता है। वह आत्मप्रशंसा में विश्वास करता है और हमेशा दूसरों को प्रोत्साहित करता है कि लोग उसकी तारीफ करें।

वह समस्याएं खड़ी करता है और समस्याएं भी ऐसी, जिन्हें वह पहले ही सुलझा चुका हो लेकिन वह समस्याओं को इस तरह सामने रखता है कि वे पहले से ज्यादा गंभीर नजर आएं। समस्या का वह हिस्सा जो वह संभाल नहीं पाता, उसे दूसरे के सिर मढ़ देता है। वह अपनी रणनीतियां बदलता जाता है, ताकि दूसरे उसे समझ ही न पाएं। वह अपनी चाल भी लगातार बदलता रहता है, ताकि दूसरे लोग उसके बारे में ठीक-ठीक कयास न लगा सकें।

जैसा कि मैंने पहले ही कहा है, वह सिर्फ अपने लक्ष्य के प्रति वफादार होता है, इसलिए वह आकार विहीन है। उसका आकार उसके उद्देश्यों से निर्धारित होता है। जैसे-जैसे उसके उद्देश्य बदलते हैं, वैसे-वैसे उसका आकार भी बदलता है। अगर उसे लगता है कि जीत उसकी होगी तो वह उठ खड़ा होता है। अगर उसे लगता है कि वह हार सकता है तो वह झुक जाता है। उसके न तो कोई सिद्धांत होते हैं और न ही कोई नैतिकता। दिमाग विहीन होने की अपेक्षा दिल विहीन होने में उसे अपनी ज्यादा भलाई नजर आती है। वह बिना अंतरात्मा के काम करता है। वह सिर्फ अपने लक्ष्य के प्रति सच्चा होता है और यही चीज उसकी ताकत की असली कुंजी है।

दरअसल, दो तरह के घाघ होते हैं। पहली किस्म का घाघ तिकड़मी होता है। उसका रास्ता काफी कुटिल होता है। वह अपने आप को 'वो' दिखाने की कोशिश करता है जो वह नहीं होता। ऐसा व्यक्ति भेड़ की शक्ल में भेड़िया होता है। वह मित्रवत होता है। इसके शिकार कई लोगों को ताउम्र महसूस नहीं होता कि उन्हें लूटा गया है। उनमें से कुछ जब तक समझते हैं, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।

दूसरी किस्म डराने या धमकाने वाले हेकड़ीबाज की होती है। वह अपनी ताकत से भोलेनाथ को नतमस्तक करता है। उनका मानना है कि जो चीज जोर जबरदस्ती से नहीं सुलझाई जा सकती, उसके लिए और अधिक जोर जबरदस्ती की जरूरत होती है। समय के साथ उसे अहसास होने लगता है कि भोलेनाथ टकराव को टालने में ही अपनी भलाई समझता है। यह अहसास उसे उत्साही बना देता है और उसका आत्मविश्वास जबरदस्त बढ़ जाता है। उसका यही आत्मविश्वास उसकी सफलता की दर को कई गुना बढ़ा देता है। धीरे-धीरे उसका आतंक बढ़ने लगता है। इसके बाद वह दूसरों पर हावी होता चला जाता है।

समय के साथ-साथ घाघ दांव पेंची, चालबाजी के हुनर और हेकड़ीबाजी के फन में इतना माहिर हो जाता है कि उसके शिकार तक उसके प्रशंसा के गीत गाने लगते हैं। क्योंकि उन्हें पता होता है कि अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो घाघ उन्हें और प्रताड़ित करेगा और जब ऐसा होता है तो वह सुपर घाघ बन जाता है। वह भोलेनाथ और उसकी नाआनी को अच्छी तरह समझ जाता है। वह आदान प्रदान के सिद्धांत में विश्वास तो करता है, लेकिन पारंपरिक लेने देन में नहीं। वह देने में कम और लेने में ज्यादा भरोसा रखता है।

भोलेनाथ का खाका:

शुरुआती दौर में अपनी सामाजिकता के चलते भोलेनाथ हमेशा 'बोझ का मारा' होता है। वह दयालु और प्रेमी जीव होता है और उसकी दिली तमन्ना होती है कि उसकी ऐसी ही छवि बने। वह अपनी उपलब्धियों को लेकर काफी विनम्र होता है। उसके लिए साध्य के साथ-साथ साधन भी महत्वपूर्ण होता है।

वह अपने अधिकारियों के साथ-साथ अपने नीचे काम करने वाले लोगों के साथ भी विनम्र होता है। वह जानता है कि किस तरह उसे सहयोग करना है और कहां विरोध, क्योंकि उसकी अंतरात्मा उसे ऐसा करने के लिए कहती है। हालांकि शुरू में वह घाघ की रणनीतियों और चालबाजियों को समझ नहीं पाता। समय के साथ वह घाघ को पहचानने लगता है, फिर भी वह उसे उसकी गलतियों के लिए क्षमा कर देता है।

दरअसल, भोलेनाथ मानता है कि घाघ को उसके कर्मो का फल भुगतना पड़ेगा। उसे लगता है कि विधि का विधान होकर रहेगा। जब ऐसा होता है, तो वह 'सुपर भोलेनाथ' बन जाता है। वह समझ नहीं पाता कि कुछ स्थितियों में भला होना 'बुराई की जीत' की गारंटी करता है। वह समझ ही नहीं पाता कि कब उसे चुप बैठना है और कब आक्रामक होना है? यहां तक कि वह यह समझ पाने में भी असफल रहता है कि कभी कभार, भलाई के लिए से हथियार भी उठाना चाहिए। ज्यादातर तो उसके पास हथियार तक नहीं होता।

गौरतलब है कि यह किताब भोलेनाथों के लिए है, जो न सिर्फ घाघ द्वारा खेले जा रहे खेलों को समझाती है, बल्कि इनसे निपटने के तरीके भी सुझाती है। यह मैक्एिविली के उस विश्वास को चुनौती देती है, जिसके अनुसार भले व्यक्ति को भी मौका नहीं मिलता और वे हमेशा बुरे लोगों के बीच रहते हुए बदहाली झेलने के लिए विवश होते हैं।

(उपरोक्त लेख जाने माने विजडम गुरु पवन चौधरी की नई पुस्तक 'ह्वेन यू आर सिन्किंग बिकम ए सब्मरीन' के हिन्दी संस्करण 'ऐसा पाल ताने कि आंधी ऊर्जा बने' का एक अंश है। इस पुस्तक का लोकार्पण 10 जून को किरण बेदी के हाथों होने जा रहा है।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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