शिलांग की खूबसूरती का चित्रण है 'ल्युनैटिक इन माई हेड' में
नई दिल्ली, 6 जून (आईएएनएस)। उत्तरपूर्व में स्थित शिलांग के चित्रण पर आधारित अंजुम हसन की पुस्तक 'ल्युनेटिक इन माई हेड' तीन चरित्रों के जरिए उस स्थान की आत्मा का चित्रण है। इसे वहां की विभिन्न जाति व परंपरा से जुड़े लोगों की आवाज कहा जा सकता है।
नई दिल्ली, 6 जून (आईएएनएस)। उत्तरपूर्व में स्थित शिलांग के चित्रण पर आधारित अंजुम हसन की पुस्तक 'ल्युनेटिक इन माई हेड' तीन चरित्रों के जरिए उस स्थान की आत्मा का चित्रण है। इसे वहां की विभिन्न जाति व परंपरा से जुड़े लोगों की आवाज कहा जा सकता है।
'दखर' जाति से जुड़े होने के कारण पुस्तक लिखने के दौरान उन्हें अपनी पहचान का लाभ मिला।
36 वर्षीय लेखक ने बैंगलोर से आईएएनएस को फोन पर कहा, "शिलांग और मेघालय अब राजनीतिक रूप से पहले से काफी बदल चुके हैं। 10 साल पहले जब मैं वहां रहती थी तब के मुकाबले आज बाहरी लोग वहां बड़े स्तर पर व्यवसाय कर रहे हैं। वहां के लोग अब शांति से रहना चाहते हैं।"
उनके अनुसार इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण बालीवुड है जो उनके हृदय में विशेष स्थान बना चुका है।
उल्लेखनीय है कि माता-पिता सहित लेखिका उत्तर प्रदेश से शिलांग जाकर बसी थीं। इस पुस्तक में उन्होंने वहां से जुड़े निजी अनुभवों का चित्रण किया है। वह वहीं जन्मी व पली-बढ़ी हैं। शायद यही कारण है कि उनकी पुस्तक अपने जन्मस्थल को बुरा कहना पसंद नहीं करती।
'हच क्रॉसवर्ड बुक अवार्ड 2007' के लिए नामांकित इस पुस्तक में शिलांग को 'स्कॉटलैंड ऑफ द ईस्ट' कहा गया है।
हसन कहती हैं, "यह पुस्तक शिलांग के साथ मेरे रिश्ते का परिणाम है। इसकी तीनों कहानियां मेरे निजी अनुभवों पर आधारित हैं। इसमें मैंने वहां के पर्यावरण में घुली शांति और लोगों की नसों मे व्याप्त संगीत को उजागर करने की कोशिश की है।"
लेखिका व कवियित्री हसन के अनुसार पुस्तक में दखर जाति की स्थिति को भी केंद्रित करने की कोशिश की गई है। उन्हें आज भी वहां न तो भीतरी और न ही बाहरी का दर्जा मिल पाया है।
वह कहती हैं, "इतने वर्षो बाद एक बार फिर से मेरा शिलांग में रहने का इरादा बना रहा है।"
हसन की पुस्तक 'ग्रास इन द हिल' भी शिलांग के उनके अनुभवों पर आधारित थी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












Click it and Unblock the Notifications