गरीबी और कुपोषण के शिकार हैं बंगाल में चाय बागान श्रमिक

कोलकाता, 4 जून (आईएएनएस)। एक कप चाय पीकर बेशक आपके चेहरे पर सुकून साफ झलकता है, लेकिन यह सुकून हम तक पहुंचाने वाले चाय बागानों में कार्यरत श्रमिकों की जिंदगी का सुकून छिन चुका है।

कोलकाता, 4 जून (आईएएनएस)। एक कप चाय पीकर बेशक आपके चेहरे पर सुकून साफ झलकता है, लेकिन यह सुकून हम तक पहुंचाने वाले चाय बागानों में कार्यरत श्रमिकों की जिंदगी का सुकून छिन चुका है।

पश्चिम बंगाल के चाय बागानों के हजारों कुपोषण के शिकार गरीब भूख से मर रहे हैं। राज्य के उत्तरी भाग में चाय के पौधरोपण से जुड़े कर्मचारियों की जिंदगी नर्क से भी बदतर नजर आ रही है।

व्यापार संघ के सूत्रों का अनुमान है कि पिछले तीन से चार सालों में उत्तर बंगाल में गरीबी की वजह से चाय बागान के 1,800 कर्मचारी मौत के मुंह में समा चुके हैं।

पौधरोपण कर्मचारी राष्ट्रीय संघ के केंद्रीय समिति के सचिव आलोक चक्रवर्ती कहते हैं, "राज्य के तराई और दोआर्स क्षेत्र के 318 बागानों में से 50 प्रतिशत अभी बदहाल हैं जबकि उनमें से 14 बंद हो चुके हैं।"

यहां तक कि उपजाऊ मानी जाने वाली भूसंपदा के कर्मचारियों की स्थिति भी अच्छी नहीं कही जा सकती।

चक्रवर्ती ने आईएएनएस से कहा, "उत्तर बंगाल में लंबे समय से चाय बागानों में ऐसी परेशानियां व्याप्त थीं। पिछले तीन-चार सालों में यहां लगभग 1,800 लोगों की मौत हो चुकी है।"

उत्तर बंगाल में लगभग 8,709 चाय बागान हैं, लेकिन उनमें से केवल 311 ऐसे हैं जो 10 हेक्टेयर या उससे ज्यादा क्षेत्र में फैले हुए हैं। बाकी सब छोटे बागान हैं। ये बागान कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, दार्जीलिंग और उत्तर दिनाजपुर जिलों में चाय बागान हैं।

चक्रवर्ती कहते हैं, "भूख से लोग मर रहे हैं। कुपोषण से शिकार कर्मचारी कमजोरी के कारण रक्तक्षीणता, तपेदिक, गिलटी-रोग और गंभीर पेचिश के शिकार भी हो रहे हैं।"

पिछले कुछ सालों से चाय बागानों में काम करने वाले कर्मचारियों को बुरी तरह चूसा जा रहा है। चावल, दाल से लेकर रोजमर्रा की छोटी-मोटी जरूरतों से जुड़ी वस्तुओं की कीमतें लगतार बढ़ रही हैं, लेकिन श्रमिकों की आय में वृद्धि नहीं की गई है। यही नहीं इन श्रमिकों के स्वास्थ्य व अन्य सुविधाओं का भी ख्याल नहीं रखा जा रहा है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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