Professor Budhlal: जन्म से हैं अंधे, भीख मांगने की मिलती थी सलाह, 'समोसा की शिक्षा' ने बना दिया 'धनवान'
इंसान पास अगर कुछ करने का जज्बा हो तो बड़ा से बड़ा लक्ष्य भी छोटा लगता है। ऐसा ही जज्बा जन्म से नेत्रहीन प्रोफेसर बुधलाल के पास है, जो आज सभी वर्ग के लोगों के लिए प्रेरणा बन गए हैं।

Professor Budhlal Motivational Story: दुनिया में संघर्ष और प्रतिकूल परिस्थितियों पर विजय पाना आसान नहीं होता। कुछ बिरले ही होते हैं, जो असुविधाओं और गरीबी के बीच रहकर खुद को साबित कर पाते हैं। सूरजपुर के रेवती नारायण मिश्रा कॉलेज में सहायक प्रोफेसर पद पर तैनात एक एक ऐसे ही शिक्षक का जिक्र करने जा रहे हैं, जिनके परिवार की कभी स्थिति ये थी कि दो वक्त की रोटी भी मुश्किल मिल पाती है। लेकिन वो ऐसे शख्स हैं, जो आज सफलता की मंजिल पर पहुंचकर आज के उन सभी युवाओं के लिए खुद में एक प्रेरणा बन चुके हैं, जो खुद की असफलता के लिए परिस्थितियों को दोषी ठहराते हैं।
असिस्टेंट प्रोफेसर बुधलाल छत्तीसगढ़ में सूरजपुर के रेवती नारायण मिश्रा कॉलेज में सहायक प्रोफेसर के पद पर तैनात हैं। वे जन्म से ही नेत्रहीन है। इसके बावजूद उन्होंने खुद को साबित कर दिखाया। उनके दृढ़ संकल्प के आगे गरीबी भी बेअसर साबित हुई। प्रोफेसर बुधलाल ने अपने पढ़ाई में जिस तरह से मेहनत की, ठीक उसी लगन से अब वो बच्चों के भविष्य को संवार रहे हैं।
बचपन में सिर से उठा पिता का साया
बुधलाल अपने गांव में मां के साथ रहते थे। परिवार गरीब था। ऐसे में नेत्रहीन बच्चे की जिंदगी बेहद कठिन होती है। बुधलाल के बचपन में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया। ऐसे में जब वो पांचवी में थे तो लोग उन्हें और उनकी मां का भीख मांगकर गुजारा करने की सलाह देते थे। लेकिन तमाम झंझटों के बावजूद बुधलाल ने हार नहीं मानी। उनके जीवन कई समस्याएं आईं, सभी का उन्होंने डटकर मुकाबला किया।
10वीं में लिया निर्णय
एक इंटरव्यू में बुधलाल ने अपने जीवन की संघर्षों के जिक्र किया। उन्होंने बताया कि गांव में लोग अच्छी और बुरी दोनों सलाह देते थे। लोग पढ़ाई को कमतर आंकते थे और सिंगिंग सीखने की सलाह देते। लोग यहां तक कहते थे कि ट्रेन में भीख मांगकर भी गुजारा हो जाएगा। बुधलाल ने बताया कि इस तरह के तंज से उनकी मां को मानसिक चोट पहुंचते थी। 2007 में जब में जब प्रोफेसर बुधलाल दसवीं कक्षा में थे तो उन्हें बड़ी शिक्षा मिली। दरअसल, वो समोसा खाना चाहते थे लेकिन उनके पास खर्च करने के दो रुपए नहीं थे, तब उन्हें नौकरी करने और पैसे कमाने का एहसास हुआ।
प्रोफेसर बने प्रेरणा
बुधलाल ने नेत्रहीनता को कमजोरी नहीं बल्कि ढाल बना लिया और जब एक बार समाज में सम्मान से जीने को उन्होंने ठान ली तो पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने लक्ष्य बनाकर पढ़ाई शुरू की। आज वो युवाओं को लिए मिशाल बन गए हैं। बुधलाल आज एक सम्मानित जिंदगी जी रहे हैं। जो उन्हें भीख मांगने की सलाह देते थे, आज वही उनकी प्रशंसा करते हैं। बुधलाल की जिंदगी लोगों के प्रेरणा बनकर उभरी है।
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