'अंग्रेजी बोलने वाले ज्यादा समझदार', क्यों बढ़ रही है आत्महीनता? अंग्रेजीयत को जानने के लिए पढ़ें ये नई किताब
भारत का आर्थिक रूप से सबसे समृद्ध राज्य महाराष्ट्र इन दिनों मराठी भाषा बोलने को लेकर उपजे विवादों की वजह से सुर्खियों में है। हालांकि मराठी भाषा को लेकर हुई हिंसा और टकराव आज के समय में कोई नई बात नहीं है।
भारत में भाषा-आधारित टकराव
पहले भी क्षेत्रीय भाषा और पहचान के नाम पर ऐसे कई घटनाक्रम सामने आते रहे हैं, लेकिन ये केवल एक भाषा थोपने का मामला नहीं है। दरअसल भारत में भाषा-आधारित टकराव दो अलग-अलग रूपों में देखने को मिलते हैं।

अंग्रेजी बोलने से जुड़ा कॉम्प्लेक्स विवाद
भारत में स्थानीय भाषाओं की अस्मिता की लड़ाई और अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी बोलने से जुड़ा कॉम्प्लेक्स विवाद का एक बड़ा मुद्दा है। लंबे समय से अक्सर लोग हिंदी भाषा का विरोध करते दिखाई दे रहे हैं, लेकिन अंग्रेजी को लेकर कुछ खास प्रतिरोध नहीं होता है।
अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा नहीं बल्कि स्टेटस सिंबल है
इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि भारत में अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा नहीं है बल्कि स्टेटस सिंबल बन चुका है। वहीं लेखक अमिताभ सत्यम की नई किताब द हिंदी मीडियम टाइप्स (The Hindi Medium Types) इसी मुद्दे को विस्तार से समझाती नजर आती है।
अमिताभ सत्यम की किताब ने खोले भाषा के कई बड़े पहलू
आईआईटी कानपुर से पढ़े अमिताभ सत्यम ने अपने किशोरावस्था से लेकर नौकरी के सालों तक के अनुभवों को अपनी किताब के जरिए लोगों तक पहुंचाया है। अमिताभ सत्यम ने अपनी किताब में बताया है कि भारत में अंग्रेजी बोलने और अंग्रेजी को अपने जीवन में शामिल करने को लेकर समाज में कितना गहरा कॉम्प्लेक्स मौजूद है।
अंग्रेजी बोलने वालों को 'ज्यादा समझदार' मान लिया जाता है
अपनी किताब में अमिताभ सत्यम ने ये भी बताया है कि कैसे धोती पहनने जैसे उनके छोटे-से शौक ने उन्हें समाज में असहज परिस्थितियों का सामना करने पर मजबूर किया था। देश के बड़े शहरों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया है कि अंग्रेजी बोलने वालों को अक्सर 'ज्यादा समझदार' मान लिया जाता है, जबकि स्थानीय भाषाओं में बात करने वाले लोगों में आत्महीनता पनप जाती है। बार बार ऐसा दिखाया जाता है कि स्थानीय भाषा बोलने वाले अंग्रेजी बोलने वालों से नीचे हैं।
स्थानीय भाषा बोलने वालों में क्यों होती है हीनभावना?
द हिंदी मीडियम टाइप्स किताब की प्रस्तावना में लिखा है- हम भारत के काले लोग, गोरेपन की खोज में। इसमें व्यंग्यात्मक अंदाज में समझाया गया है कि अंग्रेजी शासन के बाद भी भारत के अधिकतर लोग वेस्टर्न कल्चर को ही श्रेष्ठ मानते हैं। लेखक के अनुसार, अब हम अपनी परंपरा और विरासत को कमतर आंकते हैं और पश्चिम की नकल करके उसे प्रगति मान बैठे हैं।
औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया भारत
इस किताब के 9 अध्याय भारतीय समाज की औपनिवेशिक मानसिकता (Colonial Mentality) को खंगालते हैं और उससे बाहर निकलने के उपाय सुझाते हैं। विदेश यात्राओं का जिक्र करते हुए लेखक बताते हैं कि भारतीय संस्कृति और आविष्कारों को अक्सर पश्चिम ने अपना बताकर प्रस्तुत किया है। स्वतंत्रता मिलने के बाद भी भारत अपनी संस्कृति को वैश्विक मंच पर मजबूती से नहीं रख पाया है।
भाषाई पहचान और अंग्रेजी का विरोधाभास
-भारत में भाषाई पहचान इतनी गहरी है कि आजादी के बाद केवल भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन तक हो गए थे। आपको बता दें कि तेलुगू आंदोलनकारी पोट्टी श्रीरामुलु ने राज्य विभाजन के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए थे। ये घटना भारतीय इतिहास का अहम पड़ाव मानी जाती है।
-लेकिन इसी देश में अंग्रेजी को विरोध का निशाना नहीं बनाया गया। महाराष्ट्र के मौजूदा मराठी विवाद में भी यही देखने को मिलता है, जहां हिंदी पर आपत्ति जताई जाती है, लेकिन अंग्रेजी और अंग्रेज़ीयत को बिना प्रतिरोध स्वीकार कर लिया जाता है।
-भारत जैसे भाषाई अस्मिता वाले देश में अंग्रेजी का स्टेटस सिंबल बन जाना एक गहरी विडंबना है। अगर इस मनोवृत्ति को समझना है, तो अमिताभ सत्यम की किताब 'द हिंदी मीडियम टाइप्स' जरूर पढ़नी चाहिए।
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