हाथरस केस: सिर्फ जिंदा रहते ही नहीं मौत के बाद भी हैं अधिकार, ये हैं अंतिम संस्कार के नियम
नई दिल्ली। हाथरस (Hathras Case) में 19 वर्षीय दलित युवती के साथ दरिंदगी और मौत के बाद देशभर में गुस्सा है। पीड़िता के साथ जो भी हुआ वह तो जघन्य था ही लेकिन पुलिस ने जिस तरह से मामले को डील किया उसने लोगों को और गुस्से में भर दिया। दिल्ली के अस्पताल में मौत के बाद पुलिस ने पीड़िता के शव की परिवार को सौंपने की जगह आधी रात में उसका अंतिम संस्कार कर दिया। ये घटना इतनी बड़ी थी कि आखिरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने मामले पर स्वतः संज्ञान लिया और मामले में राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के साथ ही पीड़ित परिवार को 12 अक्टूबर को कोर्ट में मामले की पूरी जानकारी देने को कहा है।

घावों पर नमक छिड़कने जैसा- हाईकोर्ट
11 पेज के अपने आदेश में हाईकोर्ट ने पाया कि ऐसे में जहां राज्य की प्रशासनिक मशीनरी में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों लोगों के सामान्य और मूलभूत अधिकारों के उल्लंघन के आरोप लग रहे हों वहां मामला लोक महत्व और जनहित से जुड़ा हो जाता है।
हाईकोर्ट ने आदेश में कहा कि पीड़िता की मौत के बाद जिस तरह से उसका अंतिम संस्कार किया गया उसने हमें झकझोर दिया है। मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर जैसा बताया जा रहा है वो सच है तो ये परिवार के दुख को कम करने की जगह उनके घावों पर नमक छिड़कने जैसा है।
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क्या पुलिस कर सकती हैं अंतिम संस्कार ?
वहीं यूपी पुलिस द्वारा हाथरस में 29 सितम्बर की रात को पीड़िता के शव को जलाए जाने के बाद एक सवाल सबके मन में चल रहा है। क्या पुलिस को ये हक है कि वो परिवार की इच्छा के विरुद्ध शव का अंतिम संस्कार कर सके ?
इसका सीधा उत्तर है- नहीं।
नियमों के मुताबिक डॉक्टर द्वारा शव का परीक्षण किए जाने की सूचना दिए जाने के बाद पुलिस शव को मृतक के परिजनों का रिश्तेदारों को सौंप देगी। हालांकि नए नियमों के तहत केवल उस परिस्थिति में शव को परिजनों को नहीं सौंपा जा रहा है जहां किसी की मौत कोरोना वायरस के चलते हुई हो।

केवल इन मौकों पर पुलिस को दी जाती है बॉडी
वहीं कुछ और परिस्थितियां भी हैं जब डेड बॉडी को पुलिस को सौंप दिया जाता है। जैसे कि अगर किसी शव को लेने के लिए कोई दावा नहीं करता है तब पुलिस ऐसे शव का जिलाधिकारी द्वारा दिए निर्देश के अनुसार अंतिम संस्कार करती है। साथ ही जब शव की पहचान नहीं हो पाती है ऐसी परिस्थिति में जांच अधिकारी शव का पूरी तरह परीक्षण कर उसकी पहचान से संबंधित सभी साक्ष्य एकत्र करते हैं। इसके बाद ही इसे दफनाया या दाह संस्कार किया जाता है। पुलिस अधिकारी कई बार शव की पहचान के लिए समाचार पत्रों में इसे प्रकाशित भी कराते हैं।

क्या कहता है कानून ?
कानून की बात करें तो अंतिम संस्कार का अधिकार केवल परिवार या सगे संबंधियों को ही है। हाथरस केस में जो अब तक सामने आया है उसके मुताबिक सफदरजंग अस्पताल में सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई थीं। ऐसे में शव को परिवार को सौंप दिया जाना चाहिए था। चूंकि परिवार वहां मौजूद था और वह शव लेने से इनकार भी नहीं कर रहा था। इसलिए यहां ऐसा कोई कारण नहीं नजर आता कि शव को पुलिस को सौंप दिया जाए। राज्य का किसी के शव पर कोई हक नहीं है जब तक कि आपराधिक जांच के लिए इसकी जरूरत न हो। जो कि ऐसा लग रहा है कि सफदरजंग अस्पताल में पूरा कर लिया गया था। ये पुलिस द्वारा व्यक्ति को संविधान में दिए गए मूल अधिकार का उल्लंघन है।

संविधान में क्या मिले हैं अधिकार ?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानपूर्वक जीवन का अधिकार सिर्फ जीवत रहते ही नहीं बल्कि मृत्यु के बाद भी मिलता है। 1995 में परमानंद कटारा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान में अनुच्छेद 21 के तहत दिया गया गरिमापूर्ण जीवन और उपचार का अधिकार सिर्फ जीवित रहते नहीं बल्कि मृत्यु के बाद उसके शरीर को हासिल है।
2007 में सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि जो सम्मान एक व्यक्ति को उसके जीवित रहते मिलने की उम्मीद की जाती है, वही अधिकार उसकी मृत्यु के बाद उसके पार्थिव शरीर को भी मिलना चाहिए। कोर्ट ने मलेशिया में भारतीय युवक की मौत के बाद अधिकारियों को उसका शव देश में लाए जाने का आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि एक पिता द्वारा अपने उस बेटे की, जिसकी मौत दूसरे देश की धरती पर हुई है, अंतिम संस्कार किए जाने को तड़प होगी। क्योंकि हमारी पारंपरिक धारणा है कि किसी व्यक्ति आत्मा तभी शांति से आराम कर सकेगी जब उसके पार्थिव शरीर का विधि विधान के साथ अंतिम संस्कार किया जाए।

धार्मिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप
इसके साथ ही संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को अपने धर्म और उसकी मान्यताओं को पालन करने का अधिकार देता है। हाथरस केस में जिस तरह से आधी रात में शव को जलाया गया उसे धार्मिक अधिकारों का भी अतिक्रमण माना गया है। विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि पहले तो पीड़िता की एफआईआर में हीला हवाली की गई और सही इलाज नहीं दिया गया। जब पीड़िता मर गई तो उसके शव का रीति-रिवाज के साथ अंतिम संस्कार जाने का हक भी परिवार से छीन लिया गया।
कांग्रेस प्रदेश महासचिव विवेकानंद पाठक कहते हैं कि एक तरफ तो भाजपा खुद को हिंदूवादी कहती है तो दूसरी तरफ राज्य में लोगों को मरने के बाद भी अपनी मर्जी से रीति-रिवाज नहीं पूरे करने दिए जा रहे।












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