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नई सरकार की चुनौतियां

Manmohan Singh Government
देश में एक बार फिर धर्मनिरपेक्ष सरकार बन गई है और सांप्रदायिक राजनीति के समर्थक बुरी तरह से हार गए हैं। एक बार फिर साबित हो गया है कि इस देश में बहुमत ऐसे लोगों का है जो सांप्रदायिकता को हटाना चाहते हैं। सांप्रदायिक राजनीतिक झंडा लेकर घूमने वाली शिव सेना, भारतीय जनता पार्टी और अकाली दल को मुंह की खानी पड़ी है।

केंद्र की नई मनमोहन सिंह सरकार पर इस बार वामपंथी समर्थन की तलवार नहीं लटक रही होगी। 2004 के बाद बनी सरकार में वे बहुत सारा ऐसा काम नहीं कर पाए जिसे करना चाहते थे। आर्थिक सुधारों के मामलों में कम्यूनिस्टों के डर से प्रधान मंत्री अपने मन की नहीं कर पाए। इस बार ऐसा कोई बहाना नहीं चलेगा। 2004 के घोषणा पत्र में कांग्रेस ने वादा किया था कि दंगा नियंत्रण के बारे में एक विधेयक लाया जाएगा लेकिन पिछली सरकार के दौरान ऐसा कोई विधेयक नहीं आया या कम से कम दंगा नियंत्रण और दंगाइयों को सजा देने वाला कानून नहीं बन सका।

नई सरकार की प्राथमिकताएं

इस बार सरकार की कोशिश होनी चाहिए कि इस मामले को प्राथमिकता दे और दंगों के आतंक से अवाम को बचाने की दिशा में कदम उठाए। मनमोहन सिंह सरकार ने मुसलमानों के आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन की समस्या को समझने के लिए सच्चर कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी की रिपोर्ट आ चुकी है और यह एक महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज है। राहुल गांधी ने अपने चुनाव प्रचार के भाषणों में इस रिपोर्ट का कई बार जिक्र किया और कहा कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को आधार बना कर मुसलमानों के साथ न्याय करने की दिशा में सकारात्मक पहल की जाएगी। नई मनमोहन सरकार अगर इस लक्ष्य को हासिल करने में सफलता हासिल करती है तो यह आजादी के बाद की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।

मुश्किलों से भरा होगा आर्थिक क्षेत्र

आर्थिक क्षेत्र में भी सरकार के बहुत ही कठिन दौर से गुज़रना पड़ेगा। दुनिभा भर में फैली आर्थिक मंदी का खमियाजा हर देश को भुगतना पड़ रहा है। भारतीय उद्योग भी उसस अछूता नहीं है जिसके फलस्वरूप आम आदमी को आर्थिक कष्ट के दौर से गुजरना पड़ रहा है। सरकार को आर्थिक मंदी और उसके नतीजों से होने वाले नुकसान को प फौरन काबू में करना होगा। आर्थिक मंदी को नियंत्रण में करने की कोशिश में कई सख्त फैसले भी लेने पड़ सकते हैं। सरकार को इस मामले मे बहुत ही संभलकर रहना पड़ेगा। इस बात की पूरी संभावना है कि उद्योगपति वर्ग और उनके हितों के लिए लॉबी करने वाला वर्ग कहीं सरकार से ऐसे फैसले न करवा ले जो मुलत: मजदूर विरोधी हो।

अगर पूंजीपति वर्ग इस लक्ष्य को हासिल करने में सफल हुआ तो सरकार गरीब लोगों के बीच में अलोकप्रिय हो जाएगी जिसकी बहुत ही भारी राजनीतिक कीमत चुकानी होगी। लगता नहीं कि पूंजीपतियों को खुश करने के लिए सरकार कोई ऐसे फैसले करेगी जिससे उसकी लोकप्रियता की पूंजी में सेंध लेगे। शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की कोशिश अपने देश में बड़े पैमाने पर हो चुकी है। आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही शिक्षा संस्थाओं की स्थापना के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निजी भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया था।

शिक्षा में निजी भागीदारी

इसके पहले शिक्षा संस्थाओं और स्कूल कालेजों की स्थापना बिना सरकारी मदद के संभव नहीं होती थी लेकिन पिछले वर्षों में निजी शिक्षा संस्थाओं की दिशा में बहुत बड़े कदम उठाए गए हैं। इन शिक्षा संस्थाओं का स्तर अभी ठीक-ठाक नहीं है। ज्यादातर स्कूल कालेज ऐसे लोगों ने बनवाए हैं जिनके लिए निजी लाभ ही सबसे बड़ी प्राथमिकता है। सरकार का यह भी दायित्व है कि निजी शिक्षा संसथाओं की गुणवत्ता पर नजर रखे और इन्हें शोषण के केंद्र के रूप में विकसित न होने दे। इसका फायदा यह होगा कि एक बड़ा शिक्षित वर्ग तैयार हो जाएगा जो बाकी दुनिया में कुशल कर्मचारियों की कमी को पूरा कर सकता है। देश में आर्थिक विकास के लिए बुनियादी ढांचे की भी सही व्यवस्था नहीं है जिसकी वजह से विकास की प्रक्रिया रफ्तार नहीं पकड़ रही है। जरूरी है कि नई सरकार बुनियादी ढांचे के बारे में भी सक्रिय हो और आर्थिक विकास को गति दे। इसके अलावा नई सरकार के सामने बहुत सारे ऐसे काम हैं जिनको पूरा करने के लिए 2004 में मंसूबा बनाया गया था। जरूरी है कि नई सरकार उन लक्ष्यों को पूरा करे और जनता की उम्मीदों पर खरी उतरे।

[शेष नारायण सिंह वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार हैं।]

शेष नारायण सिंह के अन्य लेख यहां देखें

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