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मीडिया की धुन पर नाचता निरुपमा की मौत का सच

By सतीश कुमार सिंह
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Nirupama Pathak
आज सच को सामने आने से पहले कई तरह की बाधाओं को पार करना पड़ता है। उसके सामने सबसे बड़ी बाधा होती है मीडिया के भ्रामक प्रचार को दरकिनार करना। आरुषि हत्याकांड और रुचिका मामले में हम मीडिया की नकारात्मक भूमिका देख चुके हैं। मीडिया की जल्दबाजी हमेशा समझ से परे होती है। हर बार वह सिक्के के दोनों पहलू को देखे बिना अपना एकतरफा फैसला सुना देता है। लगता है उसे पुलिस और न्यायपालिका पर भरोसा नहीं है। माना कि पुलिस की छवि बदनाम है, पर अब भी देश की न्यायपालिका पर भरोसा किया जा सकता है।

पूरी मीडिया निरुपमा की मौत को ऑनर किलिंग मान रही है। हो सकता है, यह ऑनर किलिंग ही हो, पर मीडिया को किसने अधिकार दिया है कि वह न्यायपालिका का काम खुद करने लगे। दिनांक 09.05.2010 को हिन्दुस्तान में फ्रंट पेज पर "मूंछ की भेंट चढ़ी दो और जिंदगियां" शीषर्क से एक खबर प्रकाशित हुई है। इसी खबर से जोड़कर एक और शीर्षक दी गई है, "इज्जत पर हाथ डाला तो अंजाम यही होगा"। एक पंचलाइन भी प्रकाशित किया गया है, "जान पर सम्मान हावी"।

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निरुपमा और प्रियभांषु रंजन की तस्वीर भी खबर के साथ प्रकाशित की गई है। खबर में यूएनएफपीए के अनुमान का हवाला देते हुए बताया गया है कि प्रत्येक साल दुनियाभर में तकरीबन 5000 लोग ऑनर किलिंग के ग्रास बन जाते हैं। अधिकांशतः इस तरह की हत्याएँ पाकिस्तान, मिस्र, जॉर्डन, लेबनान, मोरक्को, सीरिया, तुर्की, यमन एवं अन्य खाड़ी के देशों में होती हैं। इतना ही नहीं फ्रांस, जर्मनी और यूके जैसे विकसित देशों में भी इस तरह की घटनाएँ घटित होती रहती हैं।

खबर का लब्बोलुबाव ऑनर किलिंग से जुड़ा हुआ है और इस खबर में साफ तौर पर निरुपमा की मौत को ऑनर किलिंग से जोड़कर देखा जा रहा है। निरुपमा की मौत के कुछ दिनों के बाद अभिज्ञान द्वारा संचालित एनडीटीवी के एक कार्यक्रम में भी निरुपमा की मौत के लिए पूरी तौर पर उसके घरवालों को दोषी ठहराया जा रहा था और उसकी मौत को ऑनर किलिंग की संज्ञा दी गई थी।

ज्ञातव्य है कि उसी कार्यक्रम में प्रियभांषु रंजन ने झारखंड राज्य की पुलिस और प्रषासन पर अपना पूरा विश्‍वास जताया था और न्याय मिलने के प्रति वह पूरी तरह से आश्‍वस्‍त भी था, लेकिन जैसे ही 7 मई को झारखंड पुलिस ने निरुपमा की माँ की याचिका (निरुपमा की माँ ने प्रियभांशु के ऊपर निरुपमा के साथ विवाह का वायदा करके उसका यौन शोषण करने का आरोप लगाया है।) के आधार पर उसके खिलाफ धोखाधड़ी, बलात्कार और आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया, प्रियभांषु रंजन और उसके साथियों का विश्‍वास झारखंड पुलिस पर से पूरी तरह से टूटकर कांच की तरह बिखर गया और अब वह और उसके दोस्त पूरे मामले की जाँच सीबीआई से करवाना चाहते हैं।

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भारतीय जनसंचार संस्थान के वर्तमान पाठ्यक्रम निदेषक श्री आनंद प्रधान भी इस पूरे मामले में अपने छात्रों के साथ हैं। प्रियभांशु रंजन और उसके साथियों द्वारा न्याय पाने के लिए कैंडल मार्च से लेकर इंटरनेट पर अभियान तक चलाया जा रहा है। महिला आयोग के सामने वे पहले ही गुहार लगा चुके हैं। हर कदम पर मीडिया उनके साथ है।

पर यहाँ पर यह सवाल उठता है कि क्या मीडिया के लिए कोई आचारसंहिता है या नहीं? प्रियभांशु रंजन और उसके साथियों को मीडिया की नीतियों के साथ खिलवाड़ करने की इजाजत किसने दी है? मीडिया का काम होता है-समाज को सच का आईना दिखाना, न कि उसे सच से दूर ले जाना और गलतबयानी से उसे गुमराह करना। प्रियभांशु रंजन और उसके साथी आजकल यही काम कर रहे हैं। रोज उनके उलटे-सीधे बयान मीडिया के माध्‍यम से समाज के समक्ष आ रहे हैं। यहाँ पर "सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का" वाली कहावत अक्षरषः चरितार्थ हो रही है।

प्रेम या प्यार किसे कहते हैं? यह दो आत्माओं का मिलन है या फिर दो शरीरों का। इसके तह में जाने से बचते हुए मैं इतना ही कहना चाहुँगा कि पोस्टमार्टम की रिर्पोट के अनुसार मौत के समय निरुपमा 10-12 सप्ताह की गर्भवती थी और इसकी जानकारी प्रियभांशु को भी नहीं थी। पुलिस सुत्रों के अनुसार प्रियभांशु को निरुपमा ने 19 से 28 अप्रैल के बीच कुल 33 एसएमएस भेजे थे और प्रियभांशु ने 33 में से 32 एसएमएस को डिलीट कर दिया था। मन से प्यार करें या शरीर से, दोनों स्थिति में आमतौर पर ऐसा नहीं होता है। इस पहलू पर भी मीडिया को गौर करना चाहिए।

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दूसरा पहलू यह है कि जब निरुपमा अपने घर गई थी तो उसकी जान को खतरा हो सकता है, इसका अंदाजा प्रियभांशु को तो जरुर होगा। क्या उसको अपनी महबूबा की जान बचाने के लिए सही समय पर हाथ-पैर नहीं हिलाना चाहिए था, जबकि वह लगातार निरुपमा के संपर्क में था? यह कैसा प्यार है भाई? लगता है प्रियभांशु भाई लिविंग रिलेषन तक ही सीमित रहना चाहते थे।

प्रियभांषु के कुछ दोस्तों की मानें तो निरुपमा के परिवार वाले रसूख वाले हैं तथा वे अपने प्रभाव के बल पर चल रही जाँच प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। जबकि हकीकत में निरुपमा के पिता एक बैंककर्मी हैं और उसका भाई इन्कम टैक्स विभाग में तृतीयवर्ग का एक अदना सा कर्मचारी। ये क्या पुलिस या प्रशासन पर किसी तरीके का दबाव बना सकते हैं? सच कहा जाये तो दबाव बनाने का काम तो प्रियभांशु और उसके साथी कर रहे हैं, जो सच को सामने आने से पहले ही अपना फैसला सुना चुके हैं।

आज जब झारखंड और दिल्ली पुलिस अपना काम रही है, तो प्रियभांशु और उसके साथियों को यह नागवार लग रहा है। विवेचना के बाद ही पुलिस किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकती है और इसके लिए उसको दोनों पक्षों से पूछताछ करना जरुरी है। एक पक्ष सुनकर फैसला तो हमारे देश की न्यायपालिका भी नहीं करती है। कसाब को भले फाँसी की सजा सुनाई गई है, बावजूद इसके उसे भी अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया गया था।

फिर इस मुद्दे पर प्रियभांशु और उसके साथियों की आपत्ति समझ से परे है। सीबीआई को भी यह केस दिया जा सकता है, किन्तु इस संबंध में प्रियभांशु और उसके साथियों से पूछकर यह सुनिष्चित किया जाना चाहिए कि सीबीआई द्वारा तहकीकात करने के क्रम यदि उनसे पूछताछ किया जाएगा तो फिर वे कोई नई माँग नहीं करेंगे। भारत जरुर एक लोकतांत्रिक देश है, किंतु इसका मतलब यह नहीं है कि आपको सिर्फ अधिकार दिये गये हैं। अधिकार के साथ आपके कुछ कर्तव्य भी हैं और आपको उसका भी पालन करना चाहिए।

मीडिया को चैथा स्तंभ माना गया है। टीआरपी और बाजारीकरण के दौर में मीडिया को अपनी गरिमा को नहीं खोना चाहिए। हमारे समाज में न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका तक की अपनी निष्चित परिभाषित भूमिका है। सभी को अपने दायरे में रहकर अपना काम करना चाहिए। निरुपमा मामले में भी मीडिया को संयमित भूमिका निभाने की जरुरत है।

लेखक परिचय-

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से हिन्दी पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह से मोबाईल संख्या 09650182778 के जरिये संपर्क किया जा सकता है।

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