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धन-बल है आज के लोकतंत्र का असली चेहरा

आजकल उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव चल रहे हैं। दो चरण पूरे हो चुके हैं। तीसरा और अन्तिम चरण 20 अक्टूबर को पूरा हो जाएगा। जब उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी हुई तो मेरठ के एक पॉश इलाके में बसपा कार्यालय पर बसपा के समर्थन से चुनाव लड़ने वाले इच्छुक लोगों की भीड़ लगी थी। महंगी लग्जरी गाड़ियों का रैला था। गाड़ियों में सवार हष्टपुष्ट आदमी थे। अब नेताओं का लिबास भी जुदा हो गया है। कुर्ता-पायजामा गुजरे जमाने की बात हो गयी है। झक सफेद पेंट-शर्ट के साथ सफेद ही जूते आजकल के नेताओं का 'ड्रेस कोड' है। हालांकि यही 'ड्रेस कोड' माफियाओं का भी हो चला है।

स्टेनगन धारी गनर, होलेस्टर में लटके रिवाल्वर भी आजकल के नेताओं के लिए 'स्टेट्स सिम्बल' हैं। आजकल यह तय करा मुश्किल है कि कौन नेता है और माफिया। वैसे भी अब माफिया और नेताओं के बीच बहुत बारीक अन्तर रह गया है। बहरहाल, नेताओं की उस भीड़ में 'आम आदमी' का तड़का भी था। थके-मांदे चेहरे। साधारण कपड़े पहने आम आदमी या कह लीजिए हर चुनाव में 'मुंडने वाली भेड़ें' भी शामिल थीं, जिनकी याद नेताओं को चुनाव में ही आती है। इस वक्त आम आदमी नेताओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। उसे सिर आंखों पर बैठाया जाता है। आम आदमी को लगजरी गाड़ियों का सुख भी कुछ देर के लिए चुनाव के वक्त मिल जाता है। चुनाव के बाद कौन लगजरी गाड़ी में सवारी कराएगा।

चुनाव प्रचार शुरु हुआ तो आंखें चकाचौंध हो गयीं। हर गांव रंगीन पोस्टरों और बैनरों से पट गया। एक जमाना था, जब जिला पंचायत और ग्राम पंचायत के चुनाव बिना किसी शोर-शराबे के पूरे हो जाते थे। लेकिन अब बिना 'शोर' और 'शराब' के पूरे नहीं होते। आबकारी विभाग का कहना है कि जितना राजस्व तीन महीने में आता है, इस बार एक महीने में ही आ गया। अवैध और हरियाणा से तस्करी से लाई गयी शराब का कोई हिसाब-किताब किसी के पास नहीं है। वोटर ने भी सोचा मुफ्त की शराब है, जमकर पियो।

नतीजे में कई 'वोटर' अपनी जाने से हाथ धो बैठे तो कई अस्पतलों की शरण में चले गए। ऐसा नहीं है कि ऐसी हालत सभी गांवों की है। जब हमारा देश भूखमरी और कुपोषण के मामले में पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों से भी बहुत पिछड़ा हो, तो ऐसा हो भी नहीं सकता। पैसे की भरमार उन गांवों में हुई है, जो शहरों से लगे हुए हैं। इन गांवों की जमीन अनाज उगलती हो या नहीं, लेकिन बढ़ती आवास समस्या और एक्सप्रेस हाइवे के निर्माण की वजह से जमीनें सोना उगल रही हैं। पैसा आया है तो राजनैतिक महत्वकांक्षा भी जागी है।

इस पंचायत चुनाव में एक खास बात यह भी हुई है कि एक ही परिवार के चार सदस्यों को र्निविरोध सदस्य निर्वाचित किया गया है। मेरठ के हस्तिानापुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं योगेश वर्मा। मेरठ के दौराला ब्लॉक से उनके माता-पिता सहित दो सगे भाई बीडीसी के सदस्य र्निविरोध निर्वाचित हो गए है। अब लोग खुद तय करें कि एक ही परिवार के चार सदस्य किस तरह से र्निविरोध चुने जा सकते हैं ? जब चार सदस्य एक ही परिवार के हों तो उस परिवार के सदस्य को ब्लॉक प्रमुख बनने से कौन रोक सकता है ? इस तरह से हो गयी न एक ही परिवार की सरकार ? सवाल यह है कि यह कौनसा लोकतंत्र है और इस तरह का लोकतंत्र देश और समाज को कहां ले जाएगा ? किसी चुनाव में एक ही परिवार के चार सदस्यों का र्निविरोध चुना जाना 'गिनीज वर्ल्ड बुक' में दर्ज हो चाहिए।

आरक्षण के तहत बड़ी संख्या में महिलाएं भी पंचायत चुनाव में उतरी हैं। लेकिन इनकी हैसियत किसी मुखौटे से ज्यादा नहीं है। जो सीट महिला आरक्षण में चली गयी है, उस सीट पर नेताजी ने मजबूरी में अपनी पत्नि, बहन, मां या पुत्रवधु को पर्चा भरवा दिया है। इसलिए पोस्टरों, बैनरों और अखबार के विज्ञापनों में वह हाथ जोड़े खड़ी हैं। साथ में यह जरुर लिखा है कि उम्मीदवार किस की पत्नि, बहु, मां या बेटी है। साथ में पति, ससुर, बेटे या भाई की तस्वीर भी हाथ जोड़े चस्पा है।

सब जानते हैं कि चुनाव महिला नहीं लड़ रही बल्कि महिला की आड़ में पुरुष लड़ रहा है। इसलिए महिला उम्मीदवारों की सूरत सिर्फ पोस्टरों, बैनरों और अखबारों में ही दिख रही है। कहीं-कहीं तो मुस्लिम महिला उम्मीदवार की सूरत ही सिरे से गायब है। चुनाव प्रचार से भी महिलाएं दूर है। इसकी जिम्मेदारी पुरुषों ने संभाल रखी है। असली उम्मीदवार को तो पता ही नहीं कि बाहर क्या हो रहा है। वह तो आज भी घर के अन्दर चूल्हा झोंक रही है, भैंसों को सानी कर रही है या गोबर से उपले पाथ रही है। किसी महिला के निर्वाचित होने के बाद भी उनकी हैसियत कुछ नहीं होगी। सारा काम पुरुष ही करेगा। महिला तो सिर्फ 'रबर स्टाम्प' होगी।

सोचा गया था कि महिलाओं को आरक्षण देने से महिलाओं का सशक्तिकरण होगा। क्या इन हालात में महिलाओं का सशक्तिकरण हो सकता है? कुछ लोग जब महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की मुखालफत करते हैं तो इसके पीछे एक तर्क यह भी होता है कि इससे महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं होगा, बल्कि पुरुष ही अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा को पूरा करेगा। यदि फायदा होगा भी तो शबाना आजमी, जया प्रदा या नजमा हैपतुल्ला जैसी महिलाओं का होगा, जो पहले से ही पुरुषों से भी ज्यादा सशक्त हैं। ग्राम पंचायत को तो छोड़ दें। मैट्रो शहरों के नगर-निगम में चुने जाने वाली ज्यादतर महिला पार्षद भी बस नाम की ही पार्षद होती हैं। सारा काम तो 'पार्षद पति' ही करते हैं। इस तरह से 'पार्षद पति' का एक पद स्वयं ही सृजित हो गया है। मेरे वार्ड से एक महिला पार्षद है लेकिन मैंने अपनी पार्षद का चेहरा आज तक नहीं देखा।

लोकसभा और विधान सभा के चुनाव लगातार महंगे होते गए। धन और बल वाला आदमी ही दोनों जगह जाने लगा। आम आदमी के लिए लोकसभा और विधानसभा में जाना सपना सरीखा हो गया है। नैतिकता, चरित्र, आदर्शवाद और विचारधारा अब गुजरे जमाने की बातें हो गयी हैं।

अबकी बार जिला पंचायत और ग्राम पंचायत जैसे छोटे चुनाव में बहता पैसा इस बात का इशारा कर रहा है कि अब इन छोटे चुनावों में भी उतरने के लिए आम आदमी के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है। धन और बल ही आज के लोकतंत्र का असली चेहरा है।

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