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अराजकता के हवाले आंदोलन

Violence
पंजाब में हुई हिंसा आंदोलन नहीं अराजकता है। आंदोलन समाज और विचारधारा को समर्पित होते हैं जबकि अराजकता समाज और जन की दुश्मन होती है। यह हमारी तंगनजरी है कि हम पंजाब की अराजकता को आंदोलन समझ बैठे हैं।

आंदोलन कभी किसी की जान नहीं लेते। न ट्रेनों बसों को आग लगाते हैं न ही आमजन को परेशानी में डालते हैं। ऐसे हिंसक आंदोलनों का सबसे बड़ा शिकार जनता ही बनती है। ऐसी हिंसक वारदातों के बीच जनता को होने वाली तकलीफें बयान करती हैं कि हमने आंदोलनों की अहिंसा को त्यागकर अराजकता की हिंसा का दामन थाम लिया है। पंजाब की अराजकता हमें यह बताने के लिए काफी है कि हम कभी भी किसी भी बात पर बिना सोचे-विचारे किसी भी हद तक उग्र हो सकते हैं। इस उग्रता में अगर किसी की जान जाए या सरकारी या निजी संपत्ति को नष्ट कर डाला जाए लेकिन उग्रवादियों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

सारे मुद्दे भीड़ के हवाले

हम देखते रहे हैं कि धर्म और धार्मिक मुद्दों पर ऐसी हिंसक और अराजक घटनाएं अक्सर हमारे यहां घटती रहती हैं। पंजाब की घटना भी इससे कुछ अलहदा नहीं है। हालांकि यह मुद्दा विएना में गुरुद्वारे पर हमले और डेरा सचखंड वालां नेता की हत्या से जुड़ा था परंतु पंजाब में इस पर ऐसा गुस्सा भड़का कि यह हिंसा और अराजकता में तब्दील हो गया। ट्रेनों और बसों को फूंक डाला गया। हिंसक झड़पें हुईं। कुछ को जान से भी हाथ धोना पड़ा। जनता परेशान हुई वो अलग। असमय ट्रेनों के रद्द हो जाने से न जाने कितने यात्रियों को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है इस दिक्कत को गुस्साई भीड़ भला क्या समझेगी। गुस्साई भीड़ का तो बस एक ही मकसद होता है कि कैसे भी समाज में अराजकता फैलाओ आम आदमी को मुसिबत में डालो और अपनी हिंसक रोटियां सेंको। हिंसा और अराजकता से बढ़कर उनके लिए कोई कुछ नहीं होता।

कोई ज्यादा समय नहीं हुआ है जब राजस्थान में कर्नल बैंसला के समर्थन में आरक्षण के मुद्दे पर किसी कदर हिंसक प्रदर्शन हुए थे। तमाम ट्रेनों को रोक डाला गया था। पटरियां उखाड़ फेंक दी गई थीं। बेकसूर लोगों की जानें गईं थीं। करोड़ों रुपए की सरकारी संपत्ति का नुकसान हुआ था। कुछ समय के लिए राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे देशभर में स्थिति बेहद संवेदनशील-सी हो गई थी। अब कर्नल बैंसला जैसे लोग उस अराजकता को आंदोलन का नाम दे रहे थे। जबकि वो कोई आंदोलन नहीं सामाजिक अत्याचार था।

अराजकता में बदलते आंदोलन

ऐसे उग्र और अराजक आंदोलनों को देख-सुनकर अक्सर सिर शर्म से झुक जाता है। हम ब्रिटिश गुलामी के जिस दौर से निकलकर यहां तक आए हैं वो ऐसे अराजक आंदोलनों की बिसात पर नहीं बल्कि वो टिका था सामाजिक और वैचारिक आंदोलनों के सहारे। उन क्रांतिकारी आंदोलनों में हिंसा नहीं त्याग और बलिदान था। भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद बिस्मिल राजगुरु आदि ने ऐसे ही ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रांति नहीं कर दी थी। उनकी इस आंदोलनात्मक क्रांति में गुलामी की दासता को उखाड़ फेंकने का दृढ़ जज्बा था। वे अपने आंदोलनों में कभी जनता के खिलाफ हिंसक नहीं हुए। उग्र नहीं हुए। उनकी लड़ाई अंग्रेजी सरकार से थी। जिससे वे अंत तक लड़े। और जीतकर ही माने।

लेकिन हमने तो आंदोलनों की शक्ल को ही बिगाड़ के रख दिया है। उसे हिंसक अराजक और जानलेवा बना दिया है। हम धार्मिक भावनाओं में इस कदर बहते चले गए कि बेकसूरों को मारने या नुकसान पहुंचान में कभी तकलीफ ही नहीं हुई। अफसोस हमने तो आंदोलनों की परंपरा को ही खत्म कर खूनी खेल में बदल दिया। जो लोग अराजकता और आगजनी को ही आंदोलन मानते व समझते हैं उनमें इंसानियत नहीं होती। दूसरों को तकलीफ देकर अपने उग्र आंदोलन को जारी रखना भला कहां की सामाजिकता है?

पंजाब में जो हुआ वो तकलीफदेय है। पर इससे भी ज्यादा तकलीफदेय है आंदोलनों की परंपरा का अराजकता में तब्दील होते जाना।

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