Bhumi Shayan: क्या होता है भूमि शयन? क्या होते हैं दुष्परिणाम?
नई दिल्ली, 20 सितंबर। हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक शुभ कार्य करने के लिए उचित समय बताया गया है। शुभ समय में किए गए कार्य सफल होते हैं और अशुभ समय में किए गए कार्य शीघ्र फलीभूत नहीं होते या असफल हो जाते हैं। इसका वैज्ञानिक कारण भी है। आजकल खगोल वैज्ञानिक भी यह बात मानने लगे हैं कि ग्रह-नक्षत्रों की गति और उनका आकाशगंगा में भ्रमण एक निश्चित पथ पर होता है किंतु उस पथभ्रमण के दौरान कोई समय ऐसा भी आता है जब वे ग्रह-नक्षत्र निस्तेज हो जाते हैं या आकाशगंगा के अंधेरों से घिर जाते हैं। उसका असर पृथ्वी पर होता है क्योंकिप्रत्येक ग्रह-नक्षत्र से ऊर्जा का उज्सर्जन होता रहता है। यही बात हमारे शास्त्र सदियों पूर्व लिख चुके हैं।

ऐसा ही एक समय होता है भूमि शयन का समय। जैसा कि नाम से ही ज्ञात है भूमि शयन के समय में कहा जाता है पृथ्वी सोती है। अर्थात् वह उस समय में निस्तेज और शांत होती है। ऐसे समय में कुछ विशेष कार्य होते हैं जो नहीं करना चाहिए।
क्या होता है भूमि शयन
गोचर में सूर्य जिस नक्षत्र में होता है उस नक्षत्र से 5, 7, 9, 12, 19 और 26वीं संख्या के दिन नक्षत्र में पृथ्वी शयन करती है। पृथ्वी शयन के दिनों में मकान, कूप, नलकूप, तालाब आदि का खनन करना शुभ नहीं होता। अर्थात् भूमि को खोदने वाला कोई भी कार्य भूमि शयन के दिन नहीं करना चाहिए। इससे हानि होती है।
क्या होते हैं दुष्परिणाम
भूमि शयन के दिनों में खनन कार्य करने से कार्य में असफलता मिलती है। भूमि स्वामी रोगी होता है या उसे मृत्यु तुल्य कष्ट प्राप्त होता है। भूमि स्वामी के धन की हानि होती है। भूमि शयन वाले दिन यदि भवन निर्माण प्रारंभ किया जाए तो उस भवन में निवास करने वाला प्रत्येक व्यक्ति रोगी रहता है।
दोष से मुक्ति कैसे पाएं
कई लोग तो योग्य पंडितों से मुहूर्त निकलवा लेते हैं लेकिन कई लोगों को पता नहीं होता कि उन्होंने भूमि शयन के दिन खनन का कार्य कर लिया है। ऐसे में दोष लगना स्वाभाविक है। इस दोष से मुक्ति के लिए कुछ उपाय किए जाने चाहिए। इसके लिए वास्तु शांति करवाने का विधान है। ग्रह शांति, वास्तुशांति करवानी चाहिए।












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