षटकर्मो में मुद्राओं का प्रयोग बढ़ा देता है साधना में सफलता
षटकर्मो में मुद्राओं का प्रयोग बढ़ा देता है साधना में सफलता
तांत्रिक ग्रंथों में प्रमुखता से षटकर्मो का वर्णन मिलता है। ये षटकर्म शत्रुओं को शांत करने, उन्हें वश में करने, उनका नाश करने आदि के लिए प्रयुक्त किए जाते थे। पूर्वकाल में स्वरक्षा के लिए किए जाने वाले इन षटकर्मो का प्रयोग आजकल गलत प्रयोजन के लिए होने लगा है। ये षटकर्म हैं शांतिकरण, वशीकरण, विद्वेषण, स्तंभन, उच्चाटन तथा मारण। इनका प्रयोग आजकल बहुत कम ही सफल हो पाता है। इसका कारण यह है किएक तो लोग गलत उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इनका प्रयोग करते हैं और दूसरा यह किइन क्रियाओं की सफलता के लिए आवश्यक संपूर्ण और सही विधि नहीं जानते।

षटकर्मो के प्रयोग के लिए शास्त्रों में अलग-अलग प्रकार की मुद्राओं का वर्णन है। मुद्राओं के बिना इनका प्रयोग वर्जित भी है और सफलता भी नहीं मिलती।
शांतिकरण-पुष्टिकरण : इसके लिए पद्ममुद्रा का प्रयोग करना चाहिए।
वशीकरण- इसके लिए पाश मुद्रा का प्रयोग किया जाता है। पाश का अर्थ होता है फंदा। जिस प्रकार पाश का प्रक्षेपण कर किसी को बांध लिया जाता है उसी प्रकार पाश मुद्रा का प्रयोग किसी दूरवर्ती प्राणी को बांधकर अपने अधीन कर लिया जाता है।
स्तंभन : स्तंभन के लिए गदा मुद्रा का प्रयोग किया जाता है। इससे विपक्षी की गति को रोक दिया जाता है।
विद्वेषण : इस कर्म में मूसल मुद्रा का प्रयोग किया जाता है। किन्हीं दो व्यक्तियों में पारस्परिक मतभेद पैदा करना ही इस मुद्रा और कर्म का मुख्य उद्देश्य है।
उच्चाटन : उच्चाटन कर्म के लिए वज्र मुद्रा का प्रयोग सर्वथा उचित बताया गया है। इस क्रिया के द्वारा किसी के मन को अस्थिर कर दिया जाता है। उसका मन उद्वेलित तथा डांवाडोल हो जाता है।
मारण : शास्त्रों में मारण कर्म करना मनुष्यों के लिए निषिद्ध बताया गया है। इसमें खड्गमुद्रा का प्रयोग होता हे। इस क्रूरकर्म को केवल आत्मरक्षा में जब अत्यधिक संकट आ जाए तभी प्रयोग करना चाहिए। अन्यथा साधक की हानि निश्चित होती है।












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