जानिए कब और कैसे बनते हैं रवियोग और सर्वार्थसिद्धि योग?
नई दिल्ली, 26 अक्टूबर। शुभ कार्य करने से पहले हिंदू परिवारों में शुभ मुहूर्त देखना परंपरा का अंग है। कोई भी कार्य बिना मुहूर्त और पंचांग शुद्धि देखे नहीं किया जाता है। इन शुभ योगों में अक्सर रवियोग और सर्वार्थसिद्धि योग की चर्चा होती है। आइए जानते हैं ये रवियोग और सर्वार्थसिद्धि योग क्या होते हैं और कैसे बनते हैं।

रवियोग
ज्योतिषीय परिभाषा के अनुसार सूर्य जिस नक्षत्र पर हो, उस नक्षत्र से वर्तमान चंद्र नक्षत्र चौथा, छठा, नवां, दसवां, तेरहवां और बीसवां हो तो रवियोग बनता है। उदाहरण के लिए यदि सूर्य अश्विनी नक्षत्र पर है तो चौथा रोहिणी, छठा आद्र्रा, नवां आश्लेषा, 10वां मघा, 13वां हस्त और 20वां पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र पर चंद्रमा हो तो उस दिन रवियोग होता है। रवियोग समस्त दोषों को नष्ट करने वाला माना गया है। इसमें किया गया कार्य शीघ्र फलीभूत होता है। लेकिन यदि उक्त नक्षत्रों के साथ रविवार आ जाए तो रविवार-आश्लेषा के योग से 9 वज्र, रविवार-मघा के योग से 10 मुद्गर योग बन जाता है जिसमें कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए।
सर्वार्थसिद्धि योग
- रविवार को- हस्त, मूल, तीनों उत्तरा- उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, पुष्य और अश्विनी ये 7 नक्षत्र हों
- सोमवार को- श्रवण, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य और अनुराधा ये 5 नक्षत्र हों
- मंगलवार को- अश्विनी, उत्तराभाद्रपद, कृतिका और आश्लेषा ये 4 नक्षत्र हों
- बुधवार को- रोहिणी, अनुराधा, हस्त, कृतिका, पुनर्वसु, मृगशिरा ये 6 नक्षत्र हों
- गुरुवार को- रेवती, अनुराधा, अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य ये 5 नक्षत्र हों
- शुक्रवार को- रेवती, अनुराधा, अश्विनी, पुनर्वसु और श्रवण ये 5 नक्षत्र हों
- शनिवार को- श्रवण, रोहिणी, स्वाति ये 3 नक्षत्र हों
- तो सर्वार्थसिद्धि योग बनता है। इसमें किया गया कार्य सफल होता है।












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