Yogini Dasha: आठ प्रकार की होती हैं योगिनी दशा, जीवन को करती हैं प्रभावित
नई दिल्ली, 8 जून। तंत्र शास्त्र में 64 योगिनियों का उल्लेख मिलता है। इनमें से प्रमुख अष्ट योगिनियों का तंत्र शास्त्र में विशेष महत्व बताया गया है जिनकी उपासना अष्ट भैरवों के साथ की जाती है। ज्योतिष में जिस तरह 120 वर्ष की विंशोत्तरी दशा होती है, उसी तरह 36 वर्ष की योगिनी दशा भी मही गई है। विंशोत्तरी दशा की तरह ही योगिनी दशाएं भी मनुष्य के जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित करती हैं। अष्ट योगिनी दशा को भी 27 नक्षत्रों के आधार पर बांटा गया है जो अपने समयकाल में जातक को उसके कर्मानुसार सुख-दुख प्रदान करती है। ये अष्ट योगिनी दशाएं हैं मंगला, पिंगला, धान्या, भ्रामरी, भद्रिका, उल्का, सिद्धा और संकटा। इनकी समयावधि क्रमश: 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8 वर्ष होती है। इन सबका कुल योग 36 वर्ष होता है। अर्थात् पहली मंगला दशा 1 वर्ष, दूसरी 2 वर्ष इसी तरह आठवीं संकटा दशा 8 वर्ष की होती है।

आइए जानते हैं इनका फल-
ये होती हैं अष्ट योगिनी दशाएं
मंगला : योगिनी दशा की पहली दशा है मंगला। यह एक वर्ष की होती है। इसके स्वामी चंद्र हैं और जिन जातकों का जन्म आद्र्रा, चित्रा, श्रवण नक्षत्र में होता है, उन्हें मंगला दशा होती है। यह दशा अच्छी मानी जाती है। मंगला योगिनी की कृपा जिस जातक पर हो जाती है उसे हर प्रकार के सुख-संपन्नता प्राप्त होती है। उसके संपूर्ण जीवन में मंगल ही मंगल होता है।
पिंगला : क्रमानुसार दूसरी योगिनी दशा पिंगला होती है। यह दो वर्ष की होती है। इसके स्वामी सूर्य हैं। जिनका जन्म पुनर्वसु, स्वाति, धनिष्ठा नक्षत्र में होता है उन्हें पिंगला दशा होती है। यह दशा भी शुभ होती है। पिंगला दशा में जातक के जीवन के सारे संकट शांत हो जाते हैं। उसकी उन्नति होती है और सुख-संपत्ति प्राप्त होती है।
धान्या : तीसरी योगिनी दशा धान्या होती है और यह तीन वर्ष की होती है। इसके स्वामी बृहस्पति हैं। जिनका जन्म पुष्य, विशाखा, शतभिषा नक्षत्र में होता है उन्हें धान्या दशा से जीवन प्रारंभ होता है। यह दशा जिनके जीवन में आती है उन्हें अपार धन-धान्य प्राप्त होता है।
भ्रामरी : चौथी योगिनी दशा भ्रामरी होती है और यह चार वर्ष की होती है। इसके स्वामी मंगल हैं। जिनका जन्म अश्विनी, अश्लेषा, अनुराधा, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में होता है उनकी जन्मकालिक योगिनी दशा भ्रामरी होती है। इस दशा के दौरान व्यक्ति क्रोधी हो जाता है। कई प्रकार के संकट आने लगते हैं। आर्थिक और संपत्ति का नुकसान होता है। व्यक्ति भ्रमित हो जाता है।
भद्रिका : पांचवीं योगिनी दशा भद्रिका होती है और यह पांच वर्ष की होती है। इसके स्वामी बुध हैं। जिनका जन्म भरणी, मघा, ज्येष्ठा, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में होता है उनकी जन्मकालिक योगिनी दशा भद्रिका होती है। इस दशाकाल में जातक के सुकर्मो का शुभ फल प्राप्त होता है। शत्रुओं का शमन होता है और जीवन के व्यवधान समाप्त हो जाते हैं।
उल्का : छटी योगिनी दशा उल्का होती है और यह छह वर्ष की होती है। इसके स्वामी शनि हैं। जिनका जन्म कृतिका, पूर्वा फाल्गुनी, मूल, रेवती नक्षत्र में होता है उनकी जन्मकालिक योगिनी दशा उल्का होती है। इस दशाकाल में जातक को मेहनत अधिक करनी पड़ती है। जीवन में दौड़भाग बनी रहती है। कार्यो में शिथिलता आ जाती है। कई तरह के संकट आते हैं।
सिद्धा : सातवीं योगिनी दशा सिद्ध होती है औ इसके स्वामी शुक्र हैं। जिनका जन्म रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में होता है उनकी जन्मकालिक योगिनी दशा सिद्धा होती है। इस दशा के भोग काल में जातक की संपत्ति, भौतिक सुख, प्रेम, आकर्षण प्रभाव आदि में वृद्धि होती है। जिन लोगों पर सिद्धा योगिनी की कृपा होती है उनके जीवन में कोई अभाव नहीं रह जाता है।
संकटा : योगिनी दशा चक्र की आठवीं और अंतिम दशा संकटा होती है और इसके स्वामी राहू हैं। जिनका जन्म मृगशिर, हस्त, उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में होता है उनकी जन्मकालिक दशा संकटा होती है। संकटा योगिनी दशाकाल में जातक हर ओर से परेशानियों और संकटों से घिर जाता है। संकटों के नाश के लिए इस दशा के भोगकाल में मातृरूप में योगिनी की पूजा करें।
योगिनी दशाओं को अनुकूल कैसे बनाएं
योगिनी दशा जातक के कर्मो के अनुसार फल देती है। बुरी दशा भी कभी-कभी अच्छा फल देती है और अच्छी दशाओं के समय भी संकट आ सकते हैं। योगिनी दशाओं को अनुकूल बनाने के लिए किसी भी शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि से प्रारंभ करके पूर्णिमा तक प्रत्येक योगिनी दशा के कारक ग्रह के दिन से संबंधित योगिनी के पांच हजार मंत्रों का जाप करें। संकटा दशा के कारक ग्रह राहू के लिए रविवार तथा केतु के लिए मंगलवार चुनें। संकटा दशा दरअसल राहू-केतु दोनों के लिए मानी जाती है।
ये हैं योगिनियों के मंत्र
- मंगला : ऊं नमो मंगले मंगल कारिणी, मंगल मे कर ते नम:
- पिंगला : ऊं नमो पिंगले वैरिकारिणी, प्रसीद प्रसीद नमस्तुभ्यं
- धान्या : ऊं धान्ये मंगल कारिणी, मंगलम मे कुरु ते नम:
- भ्रामरी : ऊं नमो भ्रामरी जगतानामधीश्वरी भ्रामर्ये नम:
- भद्रिका : ऊं भद्रिके भद्रं देहि देहि, अभद्रं दूरी कुरु ते नम:
- उल्का : ऊं उल्के विघ्नाशिनी कल्याणं कुरु ते नम:
- सिद्धा : ऊं नमो सिद्धे सिद्धिं देहि नमस्तुभ्यं
- संकटा : ऊं ह्रीं संकटे मम रोगंनाशय स्वाहा
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