दीपावली 2017: अकाल मृत्यु का भय टालने के लिए नर्क चतुर्दशी पर करें दीपदान
पांच दिवसीय दीपोत्सव का दूसरा दिन नर्क चतुर्दशी या रूप चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की जाती है और उनके लिए 14 दीपों का दान किया जाता है। यहां दीपों का दान करने से तात्पर्य है किसी पवित्र नदी या तालाब में दीप जलाकर छोड़ना।
नई दिल्ली। पांच दिवसीय दीपोत्सव का दूसरा दिन नर्क चतुर्दशी या रूप चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की जाती है और उनके लिए 14 दीपों का दान किया जाता है। यहां दीपों का दान करने से तात्पर्य है किसी पवित्र नदी या तालाब में दीप जलाकर छोड़ना। शास्त्रों का मत है कि नर्क चतुर्दशी के दिन दीपों का दान करने से व्यक्ति पर अकाल मृत्यु का संकट टल जाता है और उसे व उसके परिवार को आयु और आयोग्य प्राप्त होता है।


श्रीकृष्ण ने किया था नरकासुर का वध
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था। इसलिए इस दिन को नरक चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। नरकासुर ने देवताओं की माता अदिति को अपमानित करते हुए उनके आभूषण छीन लिए थे। वरूण देव को उनके छत्र से वंचित कर दिया था और उसी ने 16100 कन्याओं का अपहरण करके उन्हें बंदी बना रखा था। नरकासुर के वध के बाद श्रीकृष्ण ने इन्हीं 16100 कन्याओं को मुक्त करवाया था जो उनकी पत्नियों के रूप में जानी गईं। नरकासुर के आतंक से मुक्ति की खुशी में द्वारका और अन्य जगह दीपावली मनाई गई थी। तभी से यह दिन छोटी दीपावली के रूप में प्रसिद्ध है।

तीन दिन राजा बली का राज्य
नरक चतुर्दशी को लेकर एक और कथा प्रचलित है। भगवान वामन ने त्रयोदशी से अमावस्या की तीन दिन की अवधि के बीच दैत्यराज बली के राज्य को तीन पग में नाप लिया, तो वे बली की दान भावना से अत्यंत प्रसन्न हुए। वामन ने बली से वरदान मांगने को कहा। बली ने कहा प्रभु मैं तो अपना सबकुछ आपको दे चुका हूं अब मेरे पास मांगने के लिए कुछ नहीं है। फिर भी आप कुछ देना ही चाहते हैं तो संसार के कल्याण के लिए मुझे एक वर दे दीजिए। वह यह है कि आपने त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिन में मेरा संपूर्ण राज्य और पृथ्वी नाप ली। मेरी कामना है कि इन्हीं तीन दिनों में प्रतिवर्ष मेरा राज्य रहे और इन तीन दिनों में जो व्यक्ति मेरे राज्य में दीप दान करें उसके घर में स्थायी लक्ष्मी का निवास हो और उसे यम की यातना का सामना न करना पड़े। राजा बली की यह प्रार्थना भगवान ने स्वीकार की। और तभी से नरक चतुर्दशी के दिन दीपदान किया जाता है।

रूप चौदस का यह है महत्व
नरक चतुर्दशी को रूप चौदस भी कहा जाता है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व तिल के तेल से शरीर की मालिश करने का विधान है। इस दिन बेसन, हल्दी, चंदन का उबटन लगाया जाता है, फिर स्नान किया जाता है। इसके पीछे तर्क यह है कि यह मौसम बारिश की विदाई और सर्दी की शुरुआत के बीच का होता है। इस समय कई तरह की बीमारियां पनपती हैं। तिल के तेल की मालिश से शरीर पर कीटाणुओं, बैक्टीरिया का असर नहीं होता और शरीर में रक्त का संचार व्यवस्थित होता है। बेसन, चंदन, हल्दी शरीर को आरोग्य प्रदान करती है और सौंदर्य में वृद्धि करती है। पद्म पुराण के अनुसार जो व्यक्ति नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय के पूर्व स्नान करता है वह यमलोक नहीं जाता।

14 दीपों का दान करें
नरक चतुदर्शी के दिन संध्या के समय 14 दीपों का दान किया जाता है। इन्हें या तो किसी नदी या तालाब में प्रवाहित किया जाता है या घर के बाहर लगाया जाता है। चतुर्दशी के दिन प्रातः चार बत्ती वाला दिया किसी चौराहे पर रखें। इससे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। दुर्घटनाओं और रोग आने का अंदेशा समाप्त हो जाता है। दीये के तेल में कुछ दाने तिल्ली के भी डालें।
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