Must Read: गंभीर रोगों के संकेत देती है कुंडली

ज्योतिष शास्त्र में भी स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण माना गया है इसलिए अनेक प्रकार के ज्योतिषीय योग बताए गए हैं।

नई दिल्ली। आरोग्यं परमं सुखम्। अर्थात् अच्छा स्वास्थ्य सबसे उत्तम सुख होता है। यदि व्यक्ति स्वस्थ है तो वह जीवन के दूसरे काम आसानी से कर सकता है, लेकिन हमेशा बीमार रहता है तो न तो व आर्थिक रूप से सम्पन्न हो सकता है और न ही किसी अन्य कार्य में सफल हो पाता है। स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है, यह बात प्राचीनकाल से हमारे ऋषि-मुनि कहते आ रहे हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि वह हमेशा स्वस्थ बना रहे, लेकिन क्या ऐसा होता है? नहीं, सभी व्यक्ति पूर्णतः स्वस्थ नहीं रह पाते। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में तो स्वस्थ रहना और भी कठिन कार्य होता है। अनियमित जीवनशैली, अनियमित खानपान तो ढेरों रोगों को जन्म दे रहे हैं।

ज्योतिष शास्त्र में भी स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण माना गया है। इसलिए अनेक प्रकार के ज्योतिषीय योग बताए गए हैं, जिनसे पता किया जा सकता है कि व्यक्ति को कौन-से रोग होने की आशंका है। यदि समय रहते उन योगों के संबंध में जानकारी मिल जाए तो उन रोगों को कम करने के उपाय किए जा सकते हैं। आइये जन्मकुंडली के आधार पर हम कुछ प्रमुख रोगों के बारे में चर्चा करें।

हृदय रोग

हृदय रोग

हृदय का कारक ग्रह सूर्य है। चतुर्थ भाव से इसका विचार किया जाता है। छठा स्थान रोग स्थान है। इसलिए सूर्य तथा चतुर्थ भाव में पाप ग्रह हों, पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो हृदय रोग होने की आशंका रहती है।

1. चतुर्थ या पंचम भाव में पाप ग्रह हों या इन पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो हृदय रोग होता है।
2. पंचम तथा द्वादश भाव के स्वामी एक साथ छठे, आठवें या 12वें भाव में हों।
3. चौथे भाव में सूर्य, शनि, गुरु एक साथ हो तो गंभीर हृदय रोग होता है।
4. सप्तम या चतुर्थ भाव में मंगल, गुरु एवं शनि एक साथ हों।
5. तृतीय, चतुर्थ और पंचम इन तीनों स्थानों पर पाप ग्रह हों।

डायबिटीज

डायबिटीज

मधुमेह आजकल सबसे तेजी से बढ़ता रोग है। बच्चों में भी मधुमेह के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इस रोग के लक्षण जन्मकुंडली में स्पष्ट दिखाई दे जाते हैं��� मधुमेह मुख्यतः सूर्य के साथ बृहस्पति के दूषित होने से होता है।
1. गुरु नीच राशि का होकर छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो।
2. गुरु सूर्य के साथ अस्त हो तथा उस पर राहु की दृष्टि हो।
3. शुक्र छठे भाव में तथा गुरु बारहवें भाव में हो।
4. गुरु एवं शनि छठे, आठवें या 12वें भाव में एक साथ हो।
5. गुरु पर शनि तथा राहु की दृष्टि हो।

मानसिक रोग

मानसिक रोग

1. लग्न में चंद्र यदि बुध, शनि, राहु व केतु से दृष्ट हो तो व्यक्ति मानसिक रोगी होता है। ऐसे व्यक्ति को पागलपन का दौरा भी पड़ सकता है। यदि जन्म अमावस्या के आसपास हो तो रोग गंभीर हो सकता है।
2. चंद्र का मन से तथा बुध का बुद्धि से संबंध है। जब दोनों अशुभ प्रभाव में होंगे तो मानसिक रोग होता है। लग्न तथा लग्नेश पर भी पाप ग्रह का प्रभाव हो तो व्यक्ति दिमागी संतुलन खो देता है।
3. बुध पाप ग्रहों से पीडित होकर अष्टम में हों, छठे भाव पर भी पाप ग्रह की दृष्टि हो तो पागलपन के दौरे पड़ते हैं।
4. चंद्र और बुध के दोनों ओर के घरों में शनि, राहु, केतु हो तो व्यक्ति सनकी होता है। पागलपन में ऐसा व्यक्ति किसी की हत्या भी कर सकता है।

फेफड़ों के रोग

फेफड़ों के रोग

1. कुंडली में चतुर्थ भव तथा कर्क राशि पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तथा सूर्य एवं चंद्र चौथे, आठवें, 12वें भाव में हो तो फेफड़ों की बीमारी होती है।
2. कर्क, वृश्चिक, मीन राशि में सूर्य, चंद्र का योग हो तथा चतुर्थेश नीच राशिगत या अस्त हो।
3. चंद्र जल राशि में हो तथा शुक्र अस्त हो।
4. चंद्र जिस राशि में हो उसका स्वामी तथा सूर्य जिस राशि में हो उसका स्वामी दोनों का योग जल राशि में हो।
5. कर्क लग्न में मंगल हो तथा उस पर शनि की दृष्टि हो।

रोगों से बचने के उपाय

रोगों से बचने के उपाय

1. हृदय रोग हो तो सूर्य को ठीक करना चाहिए। प्रतिदिन सूर्योंदय के समय सूर्य को जल चढ़ाएं। आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ करें। प्रत्येक रविवार को ओम घृणिः सूर्याय नमः मंत्र की एक माला रूद्राक्ष की माला से जाप करें।
2. डायबिटीज में राहत के लिए गुरु की आराधना करना चाहिए। प्रत्येक गुरुवार को पीले पुष्प से गणेशजी आराधना करें। गुरुवार को किसी गरीब को पीली मिठाई खिलाएं।
3. मानसिक रोगों का कारक ग्रह चंद्रमा है। अतः चंद्र की शुभता के लिए 7 कैरेट का सफेद मोती चांदी की अंगूठी में पहनें। मून स्टोन का पेंडेंट भी पहन सकते हैं।
4. फेफड़ों संबंधी रोगों के लिए भी चंद्र को साधना चाहिए। चंद्र की शुभता के लिए प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर दूध में बताशा डालकर अर्पित करें।

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