9 की रात से 10 मई की सुबह तक रहेगा सूर्य ग्रहण
[ज्योतिषाचार्य पं. अनुज के शुक्ल] इस साल का पहला सूर्य ग्रहण 10 मई को पड़ने जा रहा है। इस ग्रहण हा असर भारत पर बहुत ज्यादा तो नहीं होगा क्योंकि उस समय यहां रात होगी, लेकिन धार्मिक दृष्टि से इसका महत्व जरूर है। यह इसलिये क्योंकि एक ही पक्ष में यह दूसरा ग्रहण है। एक पक्ष में दो ग्रहण होने का फल- समस्त संसार में भय, शासकों को कष्ट और फसलों को क्षति पहुंचेगी।
कंकण सूर्य ग्रहण- बैशाख कृष्ण अमावस्या को दिनांक 9 मई 2013 को पड़ेगा। भारत में यह ग्रहण कहीं पर भी दिखाई नहीं देगा। अतः इस ग्रहण का धार्मिक महात्म्य भारत में नहीं है तथा इसका सूतक भी नहीं लगेगा। यह सूर्य ग्रहण मलेशिया के दक्षिणी छोर, सुमात्रा दीप के दक्षिणी भाग, दक्षिणी फिलीपिन, इन्डोनेशिया, आस्ट्रेलिया के निकट पूर्वी हिन्द महासागर, प्रशान्त महासागर में दिखाई देगा।
ग्रहण का सूतक- 9 मई दिन गुरूवार को अपरान्ह 2:55 बजे से शुरू होगा।
सूर्य ग्रहण का कार्यकाल- 9 मई की रात 2:55 बजे से लेकर 10 मई की सुबह 8:55 बजे तक रहेगा (May 10 2:55 am to 8:55 am)। भारतीय समयानुसार।
भारत में इसका धार्मिक महात्म्य नहीं है, किन्तु मेदिनी फलकथन के परिप्रेक्ष्य में इसका अधिक महत्व है। यह ग्रहण मेष राशि एंव भरणी नक्षत्र के चतुर्थ पाद में होगा। ग्रहण काल में बुध और मंगल अस्त होकर ग्रस्त स्थिति में है। मेष राशि में उक्त समय पर पंचग्रही सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, केतु योग बना रहें है। ग्रहण पर वक्री शनि दृष्टि रहेगी।
सूर्य ग्रहण के बारे में रोचक बातें

सूर्य में निहित शक्तियां
यह तो स्पष्ट है कि सूर्य में अद्भुत शक्तियाँ निहित हैं और ग्रहण के दौरान सूर्य अपनी पूर्ण क्षमता से इन शक्तियों को विकीर्ण करता है, जिसे ध्यान-मनन के प्रयोगों द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है, किन्तु उतनी ही जितनी हमारे शरीर में क्षमता है। ग्रहण का शाब्दिक अर्थ ही लेना, अंगीकार या स्वीकार करना है। हमारे श्रृषि मुनियों नें इतना ज्ञान हमारे सम्मुख रखा है, जिसका अनुमान लगाना, अर्थात ज्ञान से ज्ञान को प्राप्त करना ही जीवन की सार्थकता है।

तंत्र, मंत्र, पूजन करें
अपने भीतर के अन्धकार को मिटाने के लिए दैविक आराधना, पूजा अर्चना इत्यादि विशेष पर्वों पर करते रहने का विधान है। जैसा कि ग्रहण काल में उत्तम यौगिक क्रिया, पूजा अनुष्ठान, मन्त्र सिद्धि, तीर्थ स्नान, जप दान आदि का अपना एक विशेष महत्त्व है। इसके प्रमाण शास्त्रों में विधमान हैं। बहुत से बुद्धिजीवी लोग कहते है कि ग्रहण काल में ध्यान मनन, जाप, उपवास इत्यादि निरा अन्धविश्वास है, इन सब का कोई औचित्य नहीं। भई मान लेते हैं कि इन सब से कुछ नहीं होता। अब यदि कोई व्यक्ति इसी बहाने (चाहे भयवश ही) कुछ समय ध्यान, जाप, पूजा पाठ आदि का आश्रय ले लेता है तो उसमें हर्ज भी क्या है?

जानवर हो उठते हैं उत्तेजित
यदि कुछ नहीं भी होने वाला तो कम से कम कुछ क्षण के लिए ही सही किसी अच्छे काम में तो लगेगा। हालाँकि इस सन्दर्भ में कोई प्रमाण नहीं है किन्तु फिर भी इसमें दो राय नहीं कि ग्रहण का प्रभाव पृ्थ्वी के समस्त जीव-जंतुओं, पशु पक्षियों, वनस्पति इत्यादि पर अवश्य पड़ता है। क्यों कि ग्रहण काल में देखने को मिलता है कि अनायास जानवर उत्तेजित हो उठते हैं, पक्षी अपने घोंसलों में दुबक जाते हैं और कईं प्रकार के फूल अपनी पंखुडियाँ समेट लेते हैं।

भारत और सूर्य ग्रहण का इतिहास
वैदिक काल से पूर्व भी खगोलीय संरचना पर आधारित कलैन्डर बनाने की आवश्कता अनुभव की गई। सूर्य ग्रहण चन्द्र ग्रहण तथा उनकी पुनरावृत्ति की पूर्व सूचना ईसा से चार हजार पूर्व ही उपलब्ध थी। ऋग्वेद के अनुसार अत्रिमुनि के परिवार के पास यह ज्ञान उपलब्ध था। वेदांग ज्योतिष का महत्त्व हमारे वैदिक पूर्वजों के इस महान ज्ञान को प्रतिविम्बित करता है।

प्राचीन काल से भारत में है ग्रहण की गणना की विधि
ग्रह नक्षत्रों की दुनिया की यह घटना भारतीय मनीषियों को अत्यन्त प्राचीन काल से ज्ञात रही है। चिर प्राचीन काल में महर्षियों नें गणना कर दी थी। इस पर धार्मिक, वैदिक, वैचारिक, वैज्ञानिक विवेचन धार्मिक एवं ज्योतिषीय ग्रन्थों में होता चला आया है। महर्षि अत्रिमुनि ग्रहण के ज्ञान को देने वाले प्रथम आचार्य थे। ऋग्वेदीय प्रकाश काल अर्थात वैदिक काल से ग्रहण पर अध्ययन, मनन और परीक्षण होते चले आए हैं। ऋग्वेद के एक मन्त्र में यह चमत्कारी वर्णन मिलता है कि "हे सूर्य् ! असुर राहू ने आप पर आक्रमण कर अन्धकार से जो आपको विद्ध कर दिया, उससे मनुष्य आपके रूप को पूर्ण तरह से देख नहीं पाये और अपने अपने कार्यक्षेत्रों में हतप्रभ से हो गए।

महर्षि अत्री और सूर्य ग्रहण
महर्षि अत्री ने अपने अर्जित ज्ञान की सामार्थ्य से छाया का दूरीकरण कर सूर्य का उद्धार किया"। अगले मन्त्र में यह आता है कि "इन्द्र नें अत्रि की सहायता से ही राहू की सीमा से सूर्य की रक्षा की थी"। इसी प्रकार ग्रहण के निरसण में समर्थ महर्षि अत्रि के तप: संधान से समुदभुत अलौकिक प्रभावों का वर्णन वेद के अनेक मन्त्रों में प्राप्त होता है।

क्या आप जानते हैं?
खगोल शास्त्रियों की गणित के अनुसार 18 वर्ष 18 दिन की समयावधि में 41 सूर्य ग्रहण और 29 चन्द्रग्रहण होते हैं। एक वर्ष में 5 सूर्यग्रहण तथा 2 चन्द्रग्रहण तक हो सकते हैं। लेकिन एक वर्ष में 2 सूर्यग्रहण तो होने ही चाहिए। यदि किसी वर्ष 2 ही ग्रहण हुए तो वो दोनो ही सूर्यग्रहण ही होंगे। उस स्थिति में चंद्र ग्रहण नहीं पड़ता। साल में ज्यादा से ज्यादा 7 ग्रहण तक हो सकते हैं। लेकिन 4 से अधिक ग्रहण बहुत कम ही देखने को मिलते हैं। प्रत्येक ग्रहण 18 वर्ष 11 दिन बीत जाने पर पुन: होता है। किन्तु वह अपने पहले के स्थान में ही हो यह निश्चित नहीं।
सूर्यग्रहण की अपेक्षा चन्द्रग्रहण अधिक देखे जाते हैं, लेकिन वास्तव में सूर्य ग्रहण ज्यादा होते हैं। 3 चन्द्रग्रहण पर 4 सूर्यग्रहण का अनुपात है। चन्द्रग्रहणों के अधिक देखे जाने का कारण यह होता है कि वे पृ्थ्वी के आधे से अधिक भाग में दिखलाई पडते हैं, जब कि सूर्यग्रहण पृ्थ्वी के बहुत बडे भाग में प्राय सौ मील से कम चौडे और दो से तीन हजार मील लम्बे भूभाग में दिखलाई पडते हैं।












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