एआई के दौर में मेक इन इंडिया और अमेरिका फर्स्ट, साझा समृद्धि के लिए एक साझेदारी
Make in India America First: बीते एक दशक में भारत विश्व की तीव्र गति से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में उभरा है। यह विकास-प्रक्रिया संरचनात्मक सुधारों, राजकोषीय सुदृढ़ीकरण, विनियामक शासन में सुधार तथा डिजिटल एवं वित्तीय समावेशन को प्रोत्साहन देने वाली पहलों से समर्थित रही है, जिन्हें प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लागू किया गया। इन उपायों ने व्यापक आर्थिक स्थिरता को सुदृढ़ किया है और भारत की दीर्घकालिक विकास क्षमता का विस्तार किया है।
अनेक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के आकलनों के अनुसार, निरंतर सुधारों की गति और वैश्विक आर्थिक स्थिरता की स्थिति में भारत वर्ष 2030 तक विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की स्थिति में है। नवीनतम आर्थिक सर्वेक्षण भी इस बात पर बल देता है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सतत विकास बनाए रखने में नीतिगत निरंतरता और संस्थागत सुदृढ़ीकरण की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

एक सुदृढ़ घरेलू आर्थिक आधार ने भारत को बाह्य आर्थिक सहभागिता को अधिक रणनीतिक स्पष्टता के साथ आगे बढ़ाने की क्षमता प्रदान की है। सामान्यतः आर्थिक कूटनीति तब अधिक प्रभावी होती है जब वह आंतरिक व्यापक आर्थिक स्थिरता और संस्थागत विश्वसनीयता पर आधारित हो। इसी परिप्रेक्ष्य में, भारत ने पिछले पाँच वर्षों में पंद्रह से अधिक मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) तथा व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौतों (CEPA) पर हस्ताक्षर किए हैं या वे वार्ता के चरण में हैं। ये समझौते व्यापार विविधीकरण और आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण की व्यापक रणनीति को प्रतिबिंबित करते हैं।
इन पहलों में भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच विकसित होता व्यापार ढाँचा द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों में एक महत्वपूर्ण विकास का प्रतिनिधित्व करता है। यह समझौता पिछले वर्ष फरवरी में जारी संयुक्त नेताओं के वक्तव्य में व्यक्त प्रतिबद्धताओं पर आधारित है, जिसमें दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार और निवेश प्रवाह को विस्तारित करने की मंशा दोहराई थी। घोषित उद्देश्यों में नवाचार तंत्र को सुदृढ़ करना, लचीली आपूर्ति श्रृंखलाएँ विकसित करना, राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को प्रोत्साहित करना तथा रोजगार सृजन को बढ़ावा देना शामिल था।
यद्यपि भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौता अभी अंतिम रूप लेने की प्रक्रिया में है, इसकी प्रारंभिक संरचना से संकेत मिलता है कि यह दीर्घकालिक व्यापारिक विवादों को सुलझाने और द्विपक्षीय वाणिज्य में पूर्वानुमेयता बहाल करने का प्रयास है। इस समझौते को दोनों लोकतांत्रिक देशों के व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी के संदर्भ में समझा जाना चाहिए, जहाँ आर्थिक सहयोग तकनीकी, भू-राजनीतिक और सुरक्षा आयामों से भी जुड़ता जा रहा है।
इस समझौते का एक प्रमुख घटक टैरिफ युक्तिकरण और पारस्परिक बाज़ार पहुंच में संशोधन है। वर्ष 2024 में संयुक्त राज्य अमेरिका को भारत के लगभग 86.35 अरब अमेरिकी डॉलर के निर्यात पर इस पुनर्संरचना का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ने की संभावना है। पूर्व में कुछ श्रेणियों के भारतीय निर्यात पर 50 प्रतिशत तक शुल्क लगाया जाता था। संशोधित व्यवस्था के अंतर्गत 30.94 अरब अमेरिकी डॉलर के निर्यात पर शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किया गया है, जबकि 10.03 अरब अमेरिकी डॉलर के निर्यात को शून्य-शुल्क श्रेणी में स्थानांतरित किया गया है।
अतिरिक्त प्रावधानों के अंतर्गत 1.04 अरब अमेरिकी डॉलर के निर्यात-जो मुख्यतः कृषि उत्पाद हैं-पर स्थापित छूट श्रेणियों के तहत शून्य पारस्परिक शुल्क जारी रहेगा। साथ ही, धारा 232 के अंतर्गत (उपयोग-आधारित प्रावधानों के अनुसार) 28.30 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के उत्पादों पर शून्य पारस्परिक शुल्क लागू होगा तथा पूर्व में लगाए गए अतिरिक्त शुल्क समाप्त किए जाएंगे। समष्टिगत रूप से ये उपाय अमेरिकी बाज़ार में उच्च शुल्क का सामना कर रहे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में भारतीय निर्यातकों को तुलनात्मक लाभ प्रदान कर सकते हैं, जिससे चयनित क्षेत्रों में मूल्य प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी।
यह समझौता कुछ विशिष्ट वस्तुओं पर चरणबद्ध रूप से शुल्क समाप्ति का प्रावधान करता है। क्रमिक उदारीकरण से घरेलू उत्पादकों को आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन, उत्पादन क्षमता उन्नयन और तकनीकी प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए समय मिलेगा। यह दृष्टिकोण व्यापार-समायोजन सिद्धांतों के अनुरूप है, जो क्षेत्रीय व्यवधानों को कम करने हेतु संक्रमणकालीन संरक्षण की आवश्यकता पर बल देते हैं। तत्काल शुल्क समाप्ति केवल गैर-संवेदनशील उत्पाद श्रेणियों तक सीमित है, जिनमें से अनेक पहले से अन्य व्यापार समझौतों के अंतर्गत उदारीकृत हैं। इससे स्पष्ट होता है कि समझौता उदारीकरण और घरेलू संरक्षण के बीच संतुलित दृष्टिकोण अपनाता है।
व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण से यह समझौता अमेरिका के साथ भारत के व्यापार अधिशेष को सुदृढ़ करने में सहायक हो सकता है। हालिया वित्तीय विश्लेषणों के अनुसार, निर्यात विस्तार और आयात लोच के आधार पर यह अधिशेष संभावित रूप से प्रतिवर्ष 90 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो सकता है। तथापि, ऐसे अनुमान वैश्विक मांग, विनिमय दर स्थिरता और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता जैसे कारकों पर निर्भर रहेंगे।
तत्काल व्यापारिक प्रभावों से परे, यह समझौता वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण के व्यापक आयामों को भी प्रभावित करता है। विस्तारित बाज़ार पहुंच को चयनित घरेलू संरक्षण उपायों के साथ संयोजित कर भारत स्वयं को उच्च-मूल्य विनिर्माण और उभरती प्रौद्योगिकी तंत्रों में एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में स्थापित करने का संकेत देता है। इस संदर्भ में भारत की "मेक इन इंडिया" और "आत्मनिर्भर भारत" पहलों तथा अमेरिका की औद्योगिक नीतिगत प्राथमिकताओं के बीच अभिसरण को पूरक आर्थिक राष्ट्रवाद के एक मॉडल के रूप में देखा जा सकता है-जहाँ घरेलू क्षमता निर्माण और रणनीतिक अंतरराष्ट्रीय साझेदारी सह-अस्तित्व में रहते हैं।
महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों के संयुक्त विकास और विनिर्माण में भारत की बढ़ती भूमिका इस व्यापक रणनीतिक साझेदारी के आर्थिक आयाम को और सुदृढ़ करती है। दोनों देशों के बीच आर्थिक पारस्परिकता रक्षा सहयोग, डिजिटल शासन और बहुपक्षीय मंचों (जैसे क्वाड) के साथ भी अंतर्संबद्ध होती जा रही है।
इतिहास वैश्विक व्यापार प्रणालियों में खुलेपन के महत्व को रेखांकित करता है। 1930 के स्मूट-हॉले टैरिफ अधिनियम को अक्सर इस उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जाता है कि किस प्रकार संरक्षणवादी नीतियाँ वैश्विक आर्थिक संबंधों को बाधित कर सकती हैं। तत्पश्चात राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट के काल में अमेरिकी नीति-परिवर्तन ने इस तथ्य को स्वीकार किया कि बाधित व्यापार मार्गों को पुनर्स्थापित करना अत्यंत कठिन होता है। ये ऐतिहासिक अनुभव आज भी व्यापार लचीलापन और रणनीतिक परस्पर निर्भरता पर चल रही समकालीन बहसों को प्रभावित करते हैं।
भारत-संयुक्त राज्य अमेरिका व्यापार समझौता एक संरचित और नियम-आधारित ढाँचे के अंतर्गत आर्थिक सहयोग को संस्थागत रूप देने का प्रयास है। टैरिफ बाधाओं में कमी, क्षेत्रीय एकीकरण को प्रोत्साहन तथा दीर्घकालिक आर्थिक उद्देश्यों के संरेखण के माध्यम से यह समझौता सतत द्विपक्षीय विकास में योगदान दे सकता है। हालांकि, इसका अंतिम प्रभाव क्रियान्वयन तंत्र, क्षेत्रीय अनुक्रियाशीलता और परिवर्तित होती वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं। लेखक राजनीतिक विश्लेषक व संघ से जुड़े हैं।)
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