आखिर तमिलनाडु में 'जल्लिकट्टू महोत्सव' पर क्यों मचा है बवाल?

जल्लिकट्टू महोत्सव तमिलनाडु के पोंगल पर्व पर होने वाली सांडों की दौड़ है।जिसमें बिना लगाम के सांड दौड़ते हैं, जिन्हें लोग रोकने की कोशिश करते हैं।

मदुरै। सांडों को काबू करने के मशहूर खेल 'जल्लिकट्टू महोत्सव' पर लगेे प्रतिबंध हटाने की मांग को लेकर मदुरै के पास अलंगनल्लूर गांव में युवकों ने आज प्रदर्शन किया जिसके बाद पुलिस ने करीब 200 लोगों को हिरासत में ले लिया।

आखिर तमिलनाडुवासी 'जल्लिकट्टू महोत्सव' को लेकर इतना इमोशनल क्यों हो रहे हैं, आखिर इस त्योहार और प्रथा के पीछे कारण क्या है, जिसके चलते आम से लेकर खास तक सुप्रीम कोर्ट से अपील कर रहा है कि वो इस महोत्सव पर से बैन हटाए।

आइए जानते हैं विस्तार से...

सांडों की दौड़ वाला महोत्सव

सांडों की दौड़ वाला महोत्सव

जल्लिकट्टू महोत्सव तमिलनाडु के पोंगल पर्व पर होने वाली सांडों की दौड़ है, जिसमें बिना लगाम के सांड दौड़ते हैं, जिन्हें लोग रोकने की कोशिश करते हैं, जो सांडों पर लगाम कस लेता है वो विजयी हो जाता है।

कुछ लोगों की मौतें भी हुईं

कुछ लोगों की मौतें भी हुईं

सांडों पर कूदकर चढ़ने वाले से अपेक्षा की जाती है कि वह उसके पीठ या कूबड़ पर लटककर एक खास दूरी तक जाए, इस दौरान कई लोग बुरी तरह से घायल हो जाते हैं, कुछ लोगों की मौतें भी हो चुकी हैं।

विजयी इंसान नायक

विजयी इंसान नायक

ऐसा माना जाता है कि इस लड़ाई में जो जीत जाता है, वो इंसान काफी साहसी और हर मुसीबत से लड़ने वाला होता है, विजयी मानव को नायक की उपाधि दी जाती है।

क्यों लगाई रोक?

क्यों लगाई रोक?

दरअसल इस महोत्सव को लेकर पिछले साल एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था जिसमें दिखाया गया था कि महोत्सव से पहले बैलों को शराब पिलाई जाती है। बैलों को मारा जाता है जिसके कारण जब दौड़ शुरू होती है तो वो गुस्से में बेतहाशा दौड़ते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने जल्लिकट्टू महोत्सव पर रोक लगा दी

सुप्रीम कोर्ट ने जल्लिकट्टू महोत्सव पर रोक लगा दी

इस वीडियो के बाद एनीमल वेल्फेयर बोर्ड ऑफ इंडिया, पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनीमल्स (पेटा) इंडिया और बैंगलोर के एक एनजीओ ने इस दौड़ को रोकने के लिए याचिका दायर की थी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने जल्लिकट्टू महोत्सव पर रोक लगा दी थी जो कि पूरे देश में लागू है।

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