कौन हैं बांकीपुर से BJP के नए उम्मीदवार नीरज कुमार? क्या है जाति? उपचुनाव में BJP या PK किसका पलड़ा भारी?

Neeraj Kumar Sinha (Bankipur Assembly seat): बिहार पटना की हॉट सीट मानी जाने वाली पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव का सियासी ड्रामा चरम पर पहुंच गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने घोषित उम्मीदवार अभिषेक कुमार सिन्हा उर्फ अभिषेक बंटी के नाम वापस लेने के महज कुछ ही मिनटों बाद एक नए उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर दिया। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह की तरफ से जारी चिट्ठी में साफ किया गया कि अब बांकीपुर से बीजेपी के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा होंगे।

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इस हाई-प्रोफाइल सीट पर जहां एक तरफ आरजेडी ने फिर से पुराना दांव खेला है, वहीं जन सुराज के रणनीतिकार प्रशांत किशोर खुद चुनाव मैदान में उतरकर सबको हैरान कर चुके हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर नीरज कुमार सिन्हा कौन हैं, पार्टी ने उन पर भरोसा क्यों जताया और इस सीट का चुनावी गणित क्या कहता है।

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नीरज कुमार सिन्हा कौन हैं? (Who is Neeraj Kumar Sinha)

  • नीरज कुमार सिन्हा जन्म पटना में 1 जुलाई 1994 को हुआ है। नीरज ग्रेजुएट (बी.ए.) हैं। फिलहाल इनकी शादी नहीं हुई है। नीरज कुमार सिन्हा साल 2006 से भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जुड़े हुए हैं। उन्होंने पार्टी में जमीनी स्तर पर लगातार काम किया है और संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाई हैं। नीरज संगठन में बूथ अध्यक्ष, मंडल महामंत्री और भाजयुमो जिला उपाध्यक्ष जैसे अहम पद पर रहे हैं।
  • नीरज फिलहाल लगातार दूसरी बार नरेंद्र भारती मंडल के मंडल अध्यक्ष हैं। बांकीपुर जैसे हाई-प्रोफाइल उपचुनाव में बीजेपी ने किसी बड़े चेहरे की बजाय संगठन में लंबे समय से सक्रिय कार्यकर्ता पर भरोसा जताया है।
  • नीरज कुमार सिन्हा का राजनीतिक जुड़ाव सिर्फ उनके व्यक्तिगत सफर तक सीमित नहीं है। उनका परिवार भी कई दशकों से जनसंघ और बाद में बीजेपी की विचारधारा से जुड़ा रहा है। बताया जाता है कि उनके चाचा स्वर्गीय नरेंद्र भारती जनसंघ के समय से सक्रिय कार्यकर्ता थे। पार्टी संगठन में उनके योगदान को देखते हुए इलाके के मंडल का नाम ही नरेंद्र भारती मंडल रखा गया।
  • आज उसी मंडल की जिम्मेदारी नीरज कुमार सिन्हा संभाल रहे हैं। इससे साफ है कि उनका संगठन से रिश्ता केवल राजनीतिक नहीं बल्कि पारिवारिक विरासत का भी हिस्सा है।

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किस जाति से हैं नीरज कुमार सिन्हा और क्या है बांकीपुर का जातीय गणित?

बांकीपुर विधानसभा का चुनाव सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक समीकरणों के लिहाज से भी बेहद दिलचस्प माना जाता है। इस सीट पर सबसे प्रभावशाली मतदाता कायस्थ समाज का है और नीरज कुमार सिन्हा भी इसी समुदाय से आते हैं।

स्थानीय राजनीति में कायस्थ समाज को कई जगह 'लाला' भी कहा जाता है। बीजेपी ने पहले अभिषेक सिन्हा को टिकट दिया था और उनके हटने के बाद भी उसी सामाजिक समीकरण को बनाए रखते हुए नीरज कुमार सिन्हा पर दांव लगाया। करीब 3.79 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर लगभग 70 हजार कायस्थ वोटर बताए जाते हैं। यही वजह है कि 1995 के बाद से इस सीट पर लगातार कायस्थ उम्मीदवार ही जीत दर्ज करते आए हैं।

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हालांकि चुनाव सिर्फ एक जाति के सहारे नहीं जीता जाता। बांकीपुर में भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य मतदाता भी बड़ी संख्या में हैं, जिन्हें बीजेपी का मजबूत पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है। इसके अलावा यादव, कुर्मी, अतिपिछड़ा वर्ग, दलित-महादलित और 30 हजार से ज्यादा मुस्लिम मतदाता भी चुनावी तस्वीर बदलने की क्षमता रखते हैं।

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तीन दशक से बीजेपी का गढ़ क्यों है बांकीपुर?

बांकीपुर को बिहार में बीजेपी का सबसे सुरक्षित किला माना जाता है। 1995 के बाद पार्टी यहां कोई विधानसभा चुनाव नहीं हारी है। परिसीमन के बाद बनी इस सीट पर पहले नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा लगातार चार बार विधायक बने। उनके निधन के बाद उनके बेटे नितिन नबीन ने राजनीतिक विरासत संभाली और लगातार पांच चुनाव जीतकर रिकॉर्ड बनाया।

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2025 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को यहां 63 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले थे। पार्टी के उम्मीदवार नितिन नबीन को लगभग 98 हजार वोट मिले, जबकि जन सुराज को करीब 8 हजार और आरजेडी उम्मीदवार रेखा गुप्ता को लगभग 47 हजार वोट मिले। इसी मजबूत रिकॉर्ड की वजह से यह सीट आज भी बीजेपी के सबसे मजबूत गढ़ों में गिनी जाती है।

अचानक उम्मीदवार क्यों बदला?

बीजेपी ने पहले अभिषेक कुमार सिन्हा को टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा था। उन्होंने नामांकन भी दाखिल कर दिया था। लेकिन बाद में उन्होंने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया और प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी को पत्र सौंपकर नामांकन वापस लेने की जानकारी दी।

इसके तुरंत बाद बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में नीरज कुमार सिन्हा को पार्टी का नया उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। इस तेजी से हुए बदलाव ने राजनीतिक गलियारों में कई चर्चाओं को जन्म दिया, हालांकि पार्टी की तरफ से आधिकारिक वजह सिर्फ उम्मीदवार की नाम वापसी ही बताई गई।

प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा?

इस उपचुनाव को सिर्फ बीजेपी बनाम आरजेडी की लड़ाई मानना बड़ी भूल होगी। इस सीट ने इसलिए भी पूरे बिहार का ध्यान खींचा है क्योंकि जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर पहली बार खुद विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। 2025 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने खुद मैदान में उतरने के बजाय संगठन पर फोकस किया था, लेकिन अब उन्होंने सीधे चुनावी मुकाबला स्वीकार किया है।

प्रशांत किशोर का कहना है कि बांकीपुर उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं, बल्कि बिहार में बदलाव की राजनीति की अगली परीक्षा है। उन्होंने अपने समर्थकों से कहा कि पिछले चुनाव के नतीजों के बाद कई कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा था। अगर जन सुराज इस सीट पर मजबूत प्रदर्शन करती है, तो इससे पूरे राज्य में पार्टी को नई ऊर्जा मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले चार वर्षों से जन सुराज ही उनका सबसे बड़ा मिशन रहा है और आने वाले वर्षों तक बिहार में बदलाव की लड़ाई जारी रहेगी।

आरजेडी और दूसरे उम्मीदवार कितना बदलेंगे मुकाबला?

बांकीपुर में मुकाबला अब त्रिकोणीय होता दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय जनता दल ने एक बार फिर रेखा कुमारी उर्फ रेखा गुप्ता को मैदान में उतारा है। पिछली बार भी वह बीजेपी के खिलाफ चुनाव लड़ चुकी हैं। वहीं तेज प्रताप यादव की नई पार्टी जनशक्ति जनता दल ने सामाजिक कार्यकर्ता वीणा मानवी को उम्मीदवार बनाया है। ऐसे में विपक्षी वोट किस तरह बंटेंगे और किसे फायदा मिलेगा, यह चुनाव का बड़ा सवाल बन गया है।

बांकीपुर का असली चुनावी गणित क्या कहता है?

बांकीपुर पटना का शहरी विधानसभा क्षेत्र है, जहां जातीय समीकरण के साथ-साथ पार्टी की संगठनात्मक ताकत भी बड़ा असर डालती है। बीजेपी यहां लगातार तीन दशक से मजबूत स्थिति में रही है और उसके पास परंपरागत शहरी वोट बैंक है।

दूसरी तरफ प्रशांत किशोर के चुनाव लड़ने से यह सीट पहले के मुकाबले ज्यादा चर्चा में आ गई है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि वह अपनी राजनीतिक पहचान को वोट में कितना बदल पाते हैं। आरजेडी भी अपनी मौजूदगी बनाए रखने की कोशिश करेगी, जबकि बाकी उम्मीदवार भी कुछ इलाकों में समीकरण प्रभावित कर सकते हैं। यानी इस बार मुकाबला सिर्फ उम्मीदवारों का नहीं, बल्कि संगठन, सामाजिक समीकरण और राजनीतिक संदेश का भी है।

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