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अरब मुल्कों में अच्छी डिमांड, खीरा-ककड़ी बनाएगा लखपति, Intercropping कर रहे यहां के किसान

किसान खीरा-ककड़ी के साथ कपास की खेती (cucumber farming) कर लाखों रुपये कमा रहे हैं। मध्य प्रदेश के धार से खीरा अरब देशों में भेजा जा रहा है। जानिए चंद रुपयों का निवेश कर कैसे लखपति बन सकते हैं किसान

धार (मध्य प्रदेश), 16 जुलाई : सब्जियों की खेती से मुनाफा कमाने की चाह रखने वाले किसान खीरा-ककड़ी का उत्पादन कर सकते हैं। खीरा-ककड़ी की खेती (cucumber farming) कर अच्छी कमाई की जा सकती है। गर्मी के सीजन के अलावा हर मौसम में सलाद खाने के शौकीन लोगों के बीच खीरा-ककड़ी काफी लोकप्रिय है। मार्केट में अच्छी डिमांड होने के कारण आमदनी अच्छी होती है। मध्य प्रदेश के धार जिले में किसान इंटरक्रॉपिंग तकनीक यानी एक ही खेत में दो फसलें लगाने पर 20-25 हजार का निवेश कर डेढ़ लाख रुपये से 1.60 लाख रुपये तक की कमाई कर सकते हैं। इंटरक्रॉपिंग के लिए किसानों को ये जानना जरूरी है कि खेत में एक फसल लगाने के बाद खाली मिट्टी पर कौन सी फसल लगाई जा सकती है। कपास और खीरा-ककड़ी की इंटरक्रॉपिंग के बारे में इस रिपोर्ट में जानिए।

एक ही खेत में कपास और ककड़ी

एक ही खेत में कपास और ककड़ी

भारत की मिट्टी में पैदा होने वाली हर फसल की अपनी खासियत है। कुछ प्रजातियां तो इतनी विशेष हैं कि अरब मुल्कों में भी यहां की फसल डिमांड में होती है। मध्य प्रदेश के धार में खीरा-ककड़ी उगाने वाले किसान कम निवेश में शानदार मुनाफा कम रहे हैं। इन किसानों का कहना है कि मुनाफा कमाने की राज इंटर क्रॉपिंग तकनीक से खेती करना है।

विदेश भेजे जा रहे भारत के उत्पाद

विदेश भेजे जा रहे भारत के उत्पाद

खबरों के मुताबिक मार्केट में अच्छी मांग को देखते हुए मध्य प्रदेश के धार जिले के कई किसान खीरा और ककड़ी की खेती बड़े पैमाने पर कर रहे हैं। किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए ज्यादा चिंता नहीं करनी पड़ती, क्योंकि खरीदार और व्यापारी इनके खेतों में आकर अच्छी कीमत पर सीधी खरीद करते हैं। दूसरे राज्यों से आने वाले बड़े व्यापारी खीरे और ककड़ी की वैक्यूम पैकिंग कराते हैं। जयपुर और गुड़गांव जैसे शहरों में बिकने के अलावा वैक्यूम पैकिंग की मदद से ताजे खीरे और ककड़ी अरब देशों में एक्सपोर्ट भी किए जाते हैं।

कैसे होती है इंटर क्रॉपिंग

कैसे होती है इंटर क्रॉपिंग

धार में खीरा-ककड़ी की खेती के संबंध में दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक मनावर के किसान इंटर क्रॉपिंग तकनीक से खेती कर कपास और ककड़ी की खेती एक ही खेत में कर रहे हैं। रिपोर्ट में बताया गया, कपास और खीरा-ककड़ी एक बार में लगाने पर साल में तीन बार फसल हासिल की जा सकती है। इंटरक्रॉपिंग का मतलब एक ही खेत में दो फसलों की रोपाई करना है। इस पद्धति में खेत में खाली जगहों पर ऐसे फसलों की रोपाई होती है जो कम जगह लेते हैं। साथ ही इनके बढ़ने की गति थोड़ी धीमी होती है। उदाहरण के लिए आलू की रोपाई के बाद कतारों के बीच खाली मिट्टी में स्वीट कॉर्न (मक्का) की रोपाई की जा सकती है।

खेत में खुद आता है व्यापारी, किसानों को वाजिब दाम

खेत में खुद आता है व्यापारी, किसानों को वाजिब दाम

मध्य प्रदेश के धार में उगाई जा रही खीरा-ककड़ी की क्वालिटी और डिमांड का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सैकड़ों किलोमीटर दूर के व्यापारी किसानों से सीधा फसल खरीदते हैं। धार से 650 किलोमीटर दूर राजस्थान के जयपुर के व्यापारी एमपी के किसानों से खीरा-ककड़ी खरीदने आते हैं। फसल 15-20 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिकती है।

दो बीघा जमीन से दो लाख तक कमाई !

दो बीघा जमीन से दो लाख तक कमाई !

दो बीघा जमीन पर लगभग 10 हजार की लागत से खीरा-ककड़ी और कपास की फसल लगाने के बाद किसानों को सालाना 2 दो लाख रुपये तक की आमदनी हो जाती है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में बताया गया कि धार के किसान हरिशंकर सोलंकी, माधव पाटीदार और हरिओम पाटीदार खीरे-ककड़ी की खेती कर शानदार बचत कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि एक बीघे जमीन पर ककड़ी की फसल उगाने में पांच पजार रुपये तक की लागत आती है। किसानों के मुताबिक एक बार में 35 हजार की पैदावार हो जाती है। एक फसल से तीन बार पैदावार मिलती है।

दो फसलों की लागत और कमाई का गणित

दो फसलों की लागत और कमाई का गणित

खीरे और ककड़ी के अलावा किसानों के मुताबिक एक बीघा जमीन पर कपास की रोपाई का खर्च लगभग 16 हजार रुपये आता है। कपास की खेती करने वाले किसानों का मानना है कि एक बार में 7 क्विंटल तक कपास उत्पादन हो जाता है। मार्केट में कपास की कीमत आठ हजार रुपये प्रति क्विंटल मिल जाती है। ऐसे में कपास की खेती से एक बार में 56 हजार रुपये कमाए जा सकते हैं। अगर इंटर क्रॉपिंग तकनीक से खीरा-ककड़ी और कपास उगाया जा रहा है तो एक बीघा जमीन पर दोनों फसलों की लागत करीब 21 हजार रुपये आती है। दोनों फसलों से एक साल में होने वाली कमाई का आकलन करने पर करीब 1.60 लाख रुपये की कुल आमदनी होती है। इस आधार पर धार के किसानों का कहना है कि बचत अच्छी हो जाती है।

खीरा-ककड़ी की खेती कैसी मिट्टी पर करें ?

खीरा-ककड़ी की खेती कैसी मिट्टी पर करें ?

ककड़ी के उत्पादन के लिए रेतीली जमीन अच्छी मानी जाती है। जानकारों की मानें तो ऐसी मिट्टी में भी खीरा-ककड़ी उपजाया जा सकता है, जिसमें दूसरी फसलों की अच्छी उपज नहीं मिल रही है। खीरे के अच्छे उत्पादन के लिए जैविक खाद का इस्तेमाल करें। रोपाई के 15-20 दिन पहले सड़ी गोबर की खाद मिलाने से अच्छे उत्पादन की संभावना होती है। एक हेक्टेयर खेत में 20-25 टन गोबर की खाद मिलाई जा सकती है।

उर्वरकों का इस्तेमाल

उर्वरकों का इस्तेमाल

खीरा-ककड़ी की खेती करते समय ध्यान देना जरूरी है कि रोपाई के पहले खेत की अंतिम जुताई के समय 20 किलो नाइट्रोजन, 50 किलो फास्फोरस और 50 किलो पोटाश मिट्टी में मिलाएं। बुआई के 40-45 दिन बाद 30 किलो नाइट्रोजन का छिड़काव अच्छे उत्पादन में मदद करता है। उर्वरकों की मात्रा एक हेक्टेयर खेत के लिए है। किसान भाई ये भी ध्यान दें कि अब सॉय हेल्थ कार्ड और लैब में मिट्टी के उर्वरकों की जांच कराने की सुविधा उपलब्ध है, ऐसे में किसी भी उर्वरक के इस्तेमाल से पहले कृषि विशेषज्ञों या वैज्ञानिकों से परामर्श जरूर लेना चाहिए।

गर्मी में फसल की सुरक्षा

गर्मी में फसल की सुरक्षा

किसी भी फसल के उत्पादन में सिंचाई भी अहम पहलू है। गर्मी मौसम में खीरा-ककड़ी की फसल की हल्की सिंचाई 4-5 दिनों के अंतर पर करते रहें। ऐसा करने से फसल पर लू और अधिक तापमान का असर नहीं पड़ता। बारिश में सिंचाई बरसात के पानी की मात्रा पर निर्भर होती है। बारिश न होने या कम होने की स्थिति में अधिक सिंचाई की जरूरत पड़ेगी।

सेहत का खजाना खीरा, जल्दी मिलता है फल

सेहत का खजाना खीरा, जल्दी मिलता है फल

विज्ञान के इस्तेमाल के कारण किसान अब उन्नत तकनीक से खेती करते हैं। खीरा-ककड़ी का सेवन शरीर में पानी की कमी को पूरा करता है। गर्मी में भारी डिमांड को देखते हुए किसान रबी और खरीफ सीजन के बीच वाले टाइम में भी खीरा और ककड़ी उपजाते हैं। खीरे की लताओं में फल लगना जल्दी शुरू हो जाता है। रोपाई के दो महीनों बाद फल मिलने लगते हैं।

खीरे की अलग-अलग किस्में

खीरे की अलग-अलग किस्में

खीरे की पॉपुलर किस्मों में कृषि विज्ञान केंद्र पूसा की ओर से विकसित की गई वेराइटी पूसा उदय और पूसा संयोग किसानों के बीच लोकप्रिय है। इसके अलावा विदेशी किस्मों में जापानी लौंग ग्रीन और पोइनसेट का भी उत्पादन किया जा रहा है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में मध्य प्रदेश के कृषि विभाग के अधिकारी महेश बर्मन ने बताया, खीरे की खेती के लिए नवंबर में प्लास्टिक के ग्लास में मिट्टी भरकर बीज का अंकुरण कराया जाता है। दो महीनों बाद खेतों में रोपाई की जाती है। इस वैज्ञानिक तरीके से खीरा-ककड़ी उपजाने पर अच्छा उत्पादन हासिल किया जा सकता है।

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