उपेंद्र कुशवाहा के बहाने क्या नीतीश कुमार बीजेपी को साधना चाहते हैं?

"मीडिया के बंधुओं ने मुझसे पूछा कि आप उधर जा रहे हैं, तो क्या तय हुआ है? इस घर में मुझे कुछ भी तय करने की ज़रूरत नहीं है. मैं बिना किसी शर्त, बिना किसी कंडीशन. नीतीशजी की अगुआई में सेवा करने कि लिए वापस आया हूँ. मैंने अपने राजनीतिक जीवन में ढेरों उतार-चढ़ाव देखें हैं, लेकिन अब हर तरह का उतार-चढ़ाव नीतीशजी के नेतृत्व में ही देखना है. यह तय रहा. ऐसा मैंने अपने अनुभव से जाना है कि सारा ज्ञान किताबों को पढ़कर नहीं आ सकता."
ये शब्द हैं पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा के, जिन्होंने नीतीश कुमार की मौजूदगी में और रालोसपा के जद(यू) में विलय के मौक़े पर ये बातें कहीं.
वहीं नीतीश कुमार ने रालोसपा के जद(यू) में विलय के मौक़े पर कहा, "उपेंद्रजी ने तो कह दिया कि वे साथ आकर काम करेंगे और उनकी कोई ख़्वाहिश नहीं, लेकिन हमलोग तो सोचेंगे न? आपकी भी प्रतिष्ठा है, आपकी भी इज़्ज़त है, आपकी भी हैसियत है. भाई उपेंद्र कुशवाहा जी तत्काल प्रभाव से जनता दल (यूनाइटेड) के संसदीय बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे. राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह ने इसके बाबत पत्र तैयार कर दिया है."
उपेंद्र कुशवाहा के यूँ बिना किसी शर्त अपने दल का किसी और दल में विलय करा देना और नीतीश कुमार का उन्हें तत्काल प्रभाव से जनता दल (यूनाइटेड) के संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाने की घोषणा करना ही अलग कहानी कहता है.
दरअसल बिहार के विधानसभा चुनाव के परिणामों ने नीतीश कुमार और उनकी पार्टी की सियासी हैसियत को कमज़ोर किया है और नीतीश कुमार गाहे-बगाहे इस दर्द को बयाँ भी करते रहते हैं कि उनके साथ धोखा हुआ. वे दोस्त और दुश्मन की पहचान करने में चूक गए.
पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में एनडीए के साथ रहते हुए भी लोजपा ने जद(यू) प्रत्याशियों के ख़िलाफ़ अपने उम्मीदवार खड़े किए. परिणामों में भी इसका असर साफ़ तौर पर देखने को मिला. जद(यू) को 28 सीटों का घाटा हुआ और पार्टी महज़ 43 सीटों पर सिमट गई.
ऐसे में नीतीश कुमार ख़ुद को भाजपा की तुलना में मज़बूत करने के लिए ख़ासी मशक्कत कर रहे हैं. इसी कड़ी में बसपा के एक मात्र विधायक को जद(यू) में शामिल कराके कैबिनेट मंत्री बना दिया गया और एकमात्र निर्दलीय विधायक को भी मंत्री पद मिल गया.
इतना ही नहीं अब वे कभी ख़ुद के साथ और अलग रहे उपेंद्र कुशवाहा को भी साथ ले आए हैं. जबकि उपेंद्र कुशवाहा बीता लोकसभा चुनाव यूपीए में रहकर और विधानसभा चुनाव अलग मोर्चा बनाकर बुरी तरह हारे. बीते विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ ही बोलते रहे.

उपेंद्र कुशवाहा और नीतीश कुमार के साथ आने और रालोसपा के जद(यू) में विलय के सवाल पर लालू प्रसाद और नीतीश कुमार दोनों के साथ काम कर चुके राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं, "देखिए कोई सिद्धांत की राजनीति तो हो नहीं रही. हर तरफ़ लोग इस कोशिश में हैं कि कैसे सांसद और विधायक बन जाएँ. सत्ता की राजनीति हो रही है. उपेंद्र एक ज़माने में नीतीश के साथ थे, नीतीश ने ही उन्हें साल 2004 में नेता प्रतिपक्ष बनवाया. वहीं से उनका क़द ऊँचा हुआ और उपेंद्र के भीतर राजनीतिक महत्वाकांक्षा जगी. तब से अब तक कई बार अलग और साथ होना जारी है, लेकिन बीते विधानसभा चुनाव के परिणाम नीतीश के लिए अपमानजनक रहे. भाजपा ने चिराग का इस्तेमाल कर नीतीश के क़द को छोटा किया. इस बात का मलाल नीतीश के चेहरे पर अनेकों बार दिख चुका है. नीतीश सदन में भी भभक से जा रहे हैं, जबकि यह उनकी शैली नहीं रही है."

उपेंद्र कुशवाहा की सियासी यात्रा
वैसे तो उपेंद्र कुशवाहा को सियासी पहचान साल 2004 में बिहार का नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद ही मिली और इसमें भी नीतीश कुमार की भूमिका निर्णायक रही. लेकिन साल 2004 से अब तक गंगा में काफ़ी पानी बह चुका है.
उपेंद्र कुशवाहा ने जहाँ राजगीर के शिविर में राज्यसभा सदस्य रहते हुए साल 2011-12 में नीतीश कुमार के सामने ऐसे सवाल किए थे कि संसदीय बोर्ड से संवाद के बग़ैर पार्टी ने कैसे विधान परिषद के सदस्य बनाए और आज उन्हें संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया है.
साल 2013 में जद(यू) से अलग होकर उन्होंने अपना अलग दल बनाया और तब से अब तक वे दो लोकसभा और दो विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं. हालाँकि वे अपने दल के गठन के पहले और जद(यू) से बाहर-भीतर होने के क्रम में नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के साथ भी रहे.

पहचान और जातीयता का रंग
भारतीय राजनीति में जातीय पहचान और अस्मिता की राजनीति के क्या मायने हैं, ये बात किसी से छिपी नहीं है.
नीतीश और उपेंद्र कुशवाहा के साथ आने के भी कई सियासी निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं. फिर से लव-कुश समीकरण की बातें होने लगी हैं. (लव यानी कुर्मी और कुश यानी कुशवाहा).
सियासी पंडित ऐसा मानते हैं कि बिहार में तीन से चार फ़ीसदी कुर्मी और 12 से 13 फ़ीसदी कुशवहा या कोइरी समुदाय को साथ रखने को ही आम लोग लव-कुश समीकरण कहते हैं.
उपेंद्र कुशवाहा के फिर से नीतीश के साथ आ जाने के सवाल पर पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "देखिए यह पहला मौक़ा नहीं कि नीतीश और उपेंद्र साथ आए हैं. नीतीश इस कोशिश में हैं कि भाजपा के सामने वे मज़बूत दिखें. उनकी बार्गेनिंग पॉवर न घटे. यह सारी क़वायद इसलिए ही हो रही है. दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत है."
बिहार में जातीय व अस्मिता की राजनीति के साथ ही नीतीश और उपेंद्र के साथ आने पर शिवानंद तिवारी कहते हैं, "देखिए नीतीश कुमार आज जिस तरह आह्लादित दिखे, वह नीतीश के व्यक्तित्व की कमज़ोरी है. हल्कापन है. ठीक है कि उपेंद्र कुशवाहा आए हैं, अच्छा है कि आपकी पार्टी की ताक़त बढ़ी, लेकिन जिस तरह का भाव नीतीश ने दिखाया. ऐसा लगा जैसे उपेंद्र कुशवाहा के साथ आने से वे प्रधानमंत्री बन जाएँगे. अब इसमें यह भी देखना होगा कि उपेंद्र को बीते विधानसभा चुनाव में कितने वोट मिले? क्या सभी दलों में कुशवाहा समाज के लोग विधायक नहीं? ख़ुद नीतीश की पार्टी में क्या कुशवाहा समाज के प्रतिनिधि नहीं? क्या भाजपा और माले को कुशवाहा समाज के लोगों के वोट नहीं मिले?"
पिछले दिनों रालोसपा के प्रभारी प्रदेश अध्यक्ष बीरेंद्र कुशवाहा समेत दल के संस्थापक कई नेता राजद में शामिल हो गए थे. उस समय राजद ने कहा था कि रालोसपा के भीतर अब सिर्फ़ उपेंद्र कुशवाहा ही बच गए हैं.

वहीं आज सीएम नीतीश कुमार की मौजूदगी में उपेंद्र कुशवाहा ख़ुद की पीठ थपथपाते दिखे और कहा- अगर रालोसपा में मैं ही अकेला बचा हूँ तो यहाँ सभागार में मौजूद तमाम लोग कौन हैं?
सीएम नीतीश कुमार ने भी यह बात मंच से दोहराई कि इनके हिसाब से तो सिर्फ़ 300 लोग जद(यू) के 150 और रालोसपा के 150 लोग सभागार में होने थे, लेकिन यहाँ तो हजारों की संख्या में लोग मौजूद हैं. चारों तरफ ख़ुशी है. बिहार के लोगों ने उन्हें सेवा का मौक़ा दिया है, और उपेंद्र कुशवाहा के साथ आ जाने से वे सभी इस काम को निर्बाध तरीक़े से करते रहेंगे. वे तो नि:स्वार्थ सेवाभाव से काम करने में यक़ीन करते हैं.
अब देखना ये है कि विधानसभा चुनाव के बाद कमज़ोर हुए नीतीश कुमार और उनकी पार्टी उपेंद्र कुशवाहा का कितना सियासी लाभ उठाती है और बड़े भाई की भूमिका में आ चुकी बीजेपी पर इसका क्या असर होता है.
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