ICSSR ने बुनकरों की आजीविका से बढ़ाने संबंधी संबलपुर विश्‍वविद्यालय स्‍टडी को किया स्‍वीकार

ओडिशा का संबंलपुर क्षेत्र हरकरघा के मामले में विश्‍व स्‍तर पर लोकप्रिय है। हरकरघा उत्‍पादों की ऊंची कीमत होने के बावजूद बुनकर अपने पारिश्रमिक से संतुष्‍ट नहीं हैं। यहां तक कि वो बुनकर जो कई पीढ़ियों से इस व्यवसाय में लगे हुए हैं उन्‍हें भी बिचौलियों के चलते सही पारिश्रमिक नहीं मिल रहा है। संबलपुरी हथकरघा बुनकरों की आजीविका को बढ़ाने और उन्हें बिचौलियों के शोषण से बचाने के लिए संबलपुर विश्वविद्यालय ने स्‍टडी की जिसे अब भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) ने स्‍वीकार कर लिया है।

Sambalpur University

आईसीएसएसआर ने विवि द्वारा बुनकरों की आजीविका बढ़ाने और उन्हें बिचौलियों के शोषण से बचाने में मदद करने के लिए सुझाए गए उपाय जो स्‍वीकार किए हैं। संबलपुर विवि के मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (एमबीए) विभाग के प्रोफेसर तुषार कांति दास द्वारा की गई स्‍टडी को किया है।

प्रोफेसर तुषार कांति दास के "संबलपुरी हैंडलूम बुनकरों की सतत आजीविका: पश्चिमी ओडिशा का एक अध्ययन" शीर्षक नाम की इस स्‍टडी में बुनकरों और उनके परिवार के सदस्यों की आजीविका को प्रभावित करने वाले विविध प्रासंगिक कारणोंं पर प्रकाश डाला है। अध्‍ययन बरगढ़, सोनपुर, बलांगीर और संबलपुर सहित पश्चिमी ओडिशा के चार जिलों में 16 हथकरघा समूहों को चुना था।

पश्चिमी ओडिशा के संबलपुर के क्षेत्र में की गई स्‍टडी में पता चला है कि हथकरघा के बुनकरों को उनके उत्‍पादों का सही मूल्‍य नही मिलने के कारण उन्‍हें अपनी अजीविका तक चलाना मुश्किल होता है। उनकी निम्न स्तर की शिक्षा और ग्रामीण अभिविन्यास उन्हें बिचौलियों के शोषण का शिकार बनाता है। अपने बनाए उत्‍पादों को बाजार तक पहुंचाने के चक्‍कर में ये बुनकर शोषण का शिकार हो रहे हैं।

इन्‍हीं बिचौलियों के चक्‍कर में पड़कर वो अनौपरिचारिक जगहों से लोन ले लेते हैं और ऋणों के नियमों को समझते नहींं है जो उन्हें ऋण जाल में धकेल देता है। स्‍टडी में ये भी पता चला है कि कोई उचित सामाजिक सुरक्षा या सुरक्षा संबंधी कार्यक्रम नहीं है जिससे बुनकरों की देखभाल कर सकें। ये ही कारण है जिसकी वजह से बुनकर अपनी अजीविका को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। इतना नहींं समस्‍याओं के चलते वो इस पेशे से बाहर भी हो रहे हैं।

संबलपुर विवि के मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (एमबीए) विभाग के प्रोफेसर तुषार कांति दास ने अपनी स्‍टडी के आधार पर ये भी बताया कि परिवार में सदस्यों की संख्या अधिक होती है, तो बुनकर मास्टर बुनकर या बिचौलियों के साथ काम करना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें उत्पादों के विपणन के बारे में परेशान नहीं होना पड़ता है। अपनी सहमति वाली मजदूरी करने वाले बुनकरों की संख्‍या बहुत कम हैं।

उन्‍होंने बताया अगर बुनकर का परिवार शिक्षित है, उस पर कर्ज नहीं है और आय भी अच्‍छी है तो वो स्‍वतंत्र रूप से काम करना पसंद करते हैं। हालांकि इन स्‍वतंत्र बुनकरों को अकुश विपणन के कारण उन्‍हें हतकरघा उप्‍ताद की बहुत कम कीमत मिलती हैं। इस अध्‍यक्षन में संबलपुर के बुनकरों को इस समस्‍या से छुटकारा दिलाने वाले उपाय भी सुझाए गए हैं।

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