Religion: क्यों होती है उज्जैन के 'महाकालेश्वर मंदिर' में भस्म से आरती?

नई दिल्ली। सोमवार, भगवान भोलेनाथ का दिन है, चलिए आज बात करते हैं उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर की जो कि भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। कहा जाता है कि इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, ऐसी मान्यता है। महाकवि कालिदास ने मेघदूत में उज्जयिनी की चर्चा करते हुए इस मंदिर की प्रशंसा की थी। वैसे तो ये आस्था का केंद्र है लेकिन ये मंदिर अपनी भस्म की आरती के लिए दुनिया भर में जाना जाता है।

आइए जानते हैं कि महाकाल की पूजा भस्म से क्यों की जाती है..

भस्म यानी राख

भस्म यानी राख

कहते हैं इंसान एक दिन इसी भस्म यानी राख में मिल जायेगा इसलिए इस भस्म से पूजा की जाती है ताकि हमेशा भस्म के जरिये इंसान भगवान शिव से जुड़ा रहे।

पेड़-पौधे-मिट्टी से प्यार

पेड़-पौधे-मिट्टी से प्यार

शिवजी हमेशा जंगलों और पहाड़ों में रहे हैं इसलिए उन्हें हमेशा पेड़-पौधे-मिट्टी से प्यार रहता है, ऐसा माना जाता है कि भस्म के जरिये इंसान उनके निकट पहुंचने की कोशिश करता है।

राख का तिलक

राख का तिलक

राख हमेशा पवित्र मानी जाती है इसलिए लोग बर्तनों को राख से मांजते थे, इसलिए जब राख का तिलक किया जाता है तो इंसान का दिल-दिमाग हमेशा शुद्द हो जाता है।

शक्ति प्रदान करता है

शक्ति प्रदान करता है

भस्म इंसान के अंदर एक शक्ति प्रदान करता है, भस्म धारण करने वाले भगवान शिव संदेश देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेना चाहिए।

जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण

जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण

कहा जाता है कि 1235 ई. में इल्तुत्मिश के द्वारा इस प्राचीन मंदिर का विध्वंस किया गया था लेकिन उसके बाद से यहां जो भी शासक रहे, उन्होंने इस मंदिर के जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया, इसीलिए मंदिर अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त कर सका है।

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