कथादेश रचते थे फणीश्वर नाथ रेणु...

साहित्य की तकरीबन सभी विधाओं में रेणु ने बराबर कलम चलाई लेकिन अपने बारे में उन्होंने नहीं के बराबर लिखा। 'धर्मयुग' में एक नवंबर 1964 में प्रकाशित 'पांडुलेख' में उन्होंने लिखा, "अपने बारे में जब कभी कुछ लिखना चाहा- जी.बी.एस. (जार्ज बर्नाड शॉ) की तस्वीर सामने खड़ी हो जाती, आंखों में व्यंग्य और दाढ़ी में एक भेदभरी मुस्कुराहट लेकर और कलम रूक जाती। अपने बारे में सही-सही कुछ भी लिखना संभव नहीं.कोई लिख भी नहीं सकता।"
उपन्यास, कहानी, नाटक और कविता के अलावा रेणु ने कई रिपोर्ताज भी लिखे। उनकी तरह महान कथाशिल्पी का पत्रकार होना अपने आप में रोचक प्रसंग है। उन्होंने 'दिनमान' पत्रिका के बिहार के प्रतिनिधि के रूप में एक से बढ़कर एक रिपोर्ट तैयार की।
रिपोर्ताज के बारे में उनका खुद का कहना था, "द्वितीय महायुद्ध ने चिकित्साशास्त्र के चीर-फाड़ विभाग को पेनिसिलिन दिया और साहित्य के कथा विभाग को रिपोर्ताज।"
रेणु खुलकर बोलने और लिखने वाले थे, उनके कथा-पात्रों से इसे बखूबी समझा जा सकता है। इसका प्रमाण 'मैला-आंचल' की भूमिका है। इसमें उन्होंने लिखा कि कथा की सारी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ वह इस उपन्यास के जरिए साहित्य की दहलीज पर खड़े हैं।
रेणु की खासियत उनका रचना संसार था। वे अपने पात्रों और परिवेश को एकाकार करना जानते थे। वे कहते थे कि उनके दोस्तों ने उन्हें काफी कुछ दिया। उन्हें चाहने वालों में साहित्यिक बिरादरी के अलावा आम लोग भी हैं, जिन्हें रेणु के शब्दों से खास लगाव होता है।
उन्हें करीब से देखने वालों का कहना है कि रेणु को कुत्तों से खास लगाव था। अलग-अलग नस्ल के कुत्तों और उनके गुणों की उन्हें बारीक पहचान थी। उनके पास एक झबरीला कुत्ता हुआ करता था। वे कहते थे, "कुत्तों की छठी इंद्री अधिक जाग्रत होती है, यही सजग लेखकों में पायी जाने वाली संवेदनशीलता है।"
भले ही रेणु ने वर्ष 1977 में ही इस दुनिया से विदा ले ली लेकिन अपनी तमाम कृतियों के कारण वे आज भी जीवंत हैं। उनके लिखे
को पढ़कर पता चलता है कि मनुष्य की आकृति या रूप रंग देखकर उसके व्यक्तित्व की कसौटी नापी नहीं जा सकती है। रेणु का कहना था कि हर व्यक्ति में एक चिनगारी छुपी होती है, जिसे महसूस करने की जरूरत होती है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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