नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में 3-8 जनवरी तक इंटरनेशनल मीट

नई दिल्ली। दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में चल रहे 'एशिया पैसिफिक ब्यूरो ड्रामा स्कूल्स मीट 2011' में राजनीति व संस्कृति की पहचान से जुड़े मुद्दों को समझने की कोशिश की जा रही है। इस सम्मेलन में चीन, हांगकांग, शंघाई, भारत, ईरान, न्यूजीलैंड, फिलीपिंस, सिंगापुर, ताइवान और थाईलैंड से प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया है। यह सम्मेलन 3 जनवरी को शुरू हो चुका है और 8 जनवरी को खत्म होगा।

'एशिया पैसिफिक ब्यूरो ड्रामा स्कूल्स' यूनेस्को के शंघाई स्थित 'इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट' की क्षेत्रीय शाखा है। भारत में कलारिप्पायटु (केरल का मार्शल नृत्य), घटक, परि-खंडा (तलवारबाजी), लाठीबाजी और थांग टा (मणिपुर में तलवारबाजी) जैसी शैलियां हैं। सुदूर पूर्व की रंगमंचीय प्रस्तुतियों में प्राचीन चीन के मार्शल आर्ट की कुंग फू, वुशु, ताजी क्वॉन और ताई ची जैसी शैलियां इस्तेमाल होती हैं।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की निदेशक अनुराध कपूर ने बताया, "मार्शल आर्ट शारीरिक प्रशिक्षण का हिस्सा है। यह दुनिया के किसी भी हिस्से के कलाकार के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हम इस सम्मेलन में शारीरिक प्रशिक्षण के अलग-अलग तरीके देख रहे हैं। हमारे छात्रों को उनकी शारीरिक भाषा के प्रशिक्षण के तहत कलारिप्पायटु और लाठीबाजी सीखनी पड़ती है।"

यूनेस्को के 'इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट' के अमेरिकी राजनयिक जेफरी सिचेल कहते हैं, "सिनेमा और टेलीविजन की तरह रंगमंच भी कल्पनाओं का स्थान है। यह प्रदर्शन को उन्नत बनाने की इजाजत देता है। भारत व चीन जैसे देश अपनी शताब्दियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत के साथ वास्तविक जीवन की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए वैश्विक सांस्कृतिक सम्बंध स्थापित करने व हाशिये के लोगों की सहायता के लिए रंगमंच का इस्तेमाल कर सकते हैं।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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