जीवन कर लेता है श्रृंगार क्यों 'कुमकुम' से?
कुमकुम केवल लाल रंग नहीं बल्कि हर शुभ काम की शुरूआत इसके बिना होती नहीं, ना तो कुमकुम बिना नवरात्र की पूजा होती है और ना ही हनुमान जी की। कुमकुम हिंदू रिवाज में काफी उच्च और प्रमुख स्थान रखता है।
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आईये आपको बताते हैं इस कुमकुम का महत्व?
- 'कुमकुम' का मतलब खुशी से होता है और बिना खुशी के तो कोई शुभ काम संभव नहीं है।
- 'कुमकुम' को मां लक्ष्मी का प्रमुख श्रृंगार मानते हैं इस कारण दिवाली पर मेन डोर पर कुमकुम से मां के पैर बनाते हैं।
- 'कुमकुम' मां दुर्गा का भी प्रिय श्रृंगार है, इसे शक्ति का भी मानक कहते हैं, इस कारण बिना इसके नवरात्र की पूजा नहीं होती।
इसलिए कहा जाता है कि जीवन कर लेता है श्रृंगार..जी हां 'कुमकुम' से, 'कुमकुम' के बारे में और बातें जानने के लिए नीचे की स्लाइडों पर क्लिक कीजिये...

हनुमान जी के लिए
कहते हैं 'कुमकुम' यानी सिंदूर से हनुमान जी ने अपने आपको रंग लिया था इस कारण 'कुमकुम' से हम भगवान हनुमान जी की क़पा पा सकते हैं।

दुल्हन का आगमन नहीं
'कुमकुम' के बिना नई दुल्हन का आगमन नहीं होता है इस कारण जब नई दुल्हन घर आती है तो उसे 'कुमकुम' मिले पानी में पैर भिगोकर आना होता है।

सौभाग्य का मानक
'कुमकुम' एक विवाहिता के लिए सौभाग्य का मानक है इसलिए कोई ब्याहता बिना 'कुमकुम' के घर से बाहर नहीं निकलती है।

बुरी दृष्टि नहीं
सरसों के तेल में 'कुमकुम' भिगोकर दरवाजे पर लगाने से घर-परिवार वालों पर बुरी दृष्टि नहीं पड़ती है।

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