Kajli Teej 2019: अखंड सुहाग और सुख-सौभाग्य के लिए करें कजली तीज

नई दिल्ली। रक्षाबंधन के बाद भाद्रपद माह के कृष्णपक्ष की तृतीया तिथि को कजली तीज मनाई जाती है। इसे सातुड़ी तीज या बड़ी तीज भी कहा जाता है। इस व्रत को सुहागिन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु के लिए करती हैं। अविवाहित कन्याएं योग्य वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत करती है। इस वर्ष कजली तीज 18 अगस्त को आ रही है। इस दिन नीमड़ी तीज माता को सत्तू से बने व्यंजन का भोग लगाया जाता है।

कजली तीज की पूजा विधि

कजली तीज की पूजा विधि

  • पूजा विधि के अनुसार मिट्टी या गोबर से एक छोटा सा तालाब बनाया जाता है। इस तालाब के किनारे नीम की एक डाली लगाई जाती है। उसके उपर लाल रंग की एक ओढ़नी लगाई जाती है। तालाब में दूध मिश्रित जल भर दिया जाता है। तालाब की पाल इतनी मजबूत बनाना चाहिए कि उसमें से दूध-जल बाहर ना बहे। किनारे पर एक दीपक जलाकर रख दें। यह पूजा शाम के समय की जाती है।
  • पूजा के लिए सबसे पहले जल के छींटे देकर रोली से तिलक करें, अक्षत अर्पित करें।
  • कुमकुम, हल्दी, मेहंदी, काजल से 13-13 बिंदियां लगाएं। नीमड़ी माता का ध्यान करते हुए उन्हें सुहाग की सामग्री अर्पित करें।
  • मौली का एक टुकड़ा लेकर झूले की तरह चिपका दें।
  • सत्तू के लड्डू नेवैद्य के रूप में माता को भेंट करें।
  • इसके बाद कथा सुनें। रात में चंद्रोदय होने पर चांद की पूजा करें। चांदी के बर्तन में भरकर सात घूंट दूध पीयें।
सातुड़ी तीज की कथा

सातुड़ी तीज की कथा

एक साहूकार था, उसके सात बेटे थे। उसका सबसे छोटा बेटा अपाहिज था और उसे रोज वेश्या के यहां जाने की बुरी आदत थी। उसकी पत्नी बहुत पतिव्रता थी इसलिए वह पति के प्रत्येक आदेश का पालन करती थी। पति के कहे अनुसार वह रोज उसे अपने कंधे पर बैठाकर वेश्या के यहां छोड़ने जाती थी। उसके घर की स्थिति बहुत दयनीय थी, वह अपनी जेठानियों के यहां काम करके जैसे-तैसे अपना घर चलाती थी। भाद्रपद माह में कजली तीज आई तो घर की सभी बहुओं ने कजली तीज की पूजा के लिए सातु बनाए। सबसे छोटी बहू गरीब थी तो सास ने उसके लिए भी एक सातु का छोटा सा लड्डू बनाया। शाम को बहू पूजा करने बैठी तो उसका पति बोला मुझे वेश्या के यहां छोड़ के आ। पति का आदेश सुनकर वह उसे कंधे पर बिठाकर वेश्या के यहां छोड़ने गई। उस दिन पति उसे घर जाने का बोलना भूल गया। वह बाहर ही उसका इंतजार करने लगी।

आवतारी जावतारी दोना खोल के पी, पिया प्यारी होय..

आवतारी जावतारी दोना खोल के पी, पिया प्यारी होय..

तभी जोरदार बारिश होने लगी और बरसाती नदी में पानी बढ़ने लगा। कुछ देर बाद नदी से आवाज आई आवतारी जावतारी दोना खोल के पी, पिया प्यारी होय....। आवाज सुनकर स्त्री ने नदी की ओर देखा तो एक दोना नदी में तैरता हुआ आता दिखाई दिया। उसने दोना उठाया तो उसमें दूध भरा हुआ था। उसने आवाज के कहे अनुसार दोना उठाकर सात घूंट में सारा दूध पी लिया। उसी समय से उसके दिन फिरने लगे। कुछ दिन बाद वेश्या ने उस स्त्री के अपाहिज पति से जो भी धन लिया था, उसे वापस लौटाकर वह हमेशा के लिए गांव छोड़कर चली गई। तीज माता की कृपा से उसका अपाहिज पति भी सही मार्ग पर लौट आया और स्त्री का जीवन पुनः सुखों से भर गया।

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