मेडल बेच बेटी का इलाज कराएंगे शिल्पगुरु झारा

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रायपुर। छत्तीसगढ़ में लोक कलाकारों की क्या हालत है, यह किसी से छिपी नहीं है। देश-विदेश में प्रदेश को ख्याति दिलाने वाले भी आज अपने बेहतर इलाज के लिए खैराती अस्पताल के बिस्तर पर अंतिम सांसें गिन रहे हैं।

"राष्ट्रपति जी. ये सोने के टुकड़े और कागज के पुर्जे ले लीजिए और बदले में मेरी बेटी की जिंदगी बचा लीजिए।" ये गुहार लगाने पर मजबूर शख्स हैं गोविंदलाल झारा, जिन्हें एक वक्त सरकार ने राष्ट्रपति पुरस्कार और असंख्य प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया था। लेकिन आज वह उन्हीं सोने के पदक और प्रमाणपत्रों के बीच बैठे, अपनी इकलौती बेटी को मौत में मुंह में जाते हुए देखने को मजबूर हैं।

एक परिवार, जिसमें 7 लोगों को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है, अपने क्षेत्र के विधायक और कलेक्टर से टका-सा जवाब पाने के बाद अब अपनी सारी उम्मीदें राष्ट्रपति से लगाकर बैठे हैं। संजीवनी राहत कोष से पैसे के लिए वह चार माह से भटक रहे हैं, लेकिन कागजी कार्रवाई के नाम पर अधिकारी उन्हें भटका रहे हैं। अब तो यह शिल्पकार मेडल भी बेचने को तैयार हैं।

ढोकरा शिल्प, धातु ढलाई और बैल मेटल कास्टिंग के जादूगर गोविंदलाल झारा, जिन्हें सब सम्मान से गुरुजी बुलाते हैं, ने अपनी सारी जिंदगी कला का साधना में लगा दी। गोविंदलाल जी को शिखर सम्मान, शिल्पगुरु सम्मान और दाऊ मंदराजी सम्मान से भी नवाजा जा चुका है, लेकिन सरस्वती के पुजारी इन कलाकारों को जब अपनी जान बचाने के लिए लक्ष्मी की जरूरत पड़ी तो सरकार के नुमाइंदों ने इनके सामने नियमों का ढेर रख दिया।

गुरुजी की जिंदगी में विपत्ति की शुरुआत तब हुई, जब उनकी इकलौती बेटी वृंदावती के पेट में तकलीफ शुरू हुई। रायगढ़ के पास एक छोटे से गांव एकताल में रहने वाले झारा परिवार ने पहले रायगढ़ में एक निजी अस्पताल में इलाज करवाया। वहां चिकित्सकों ने बताया कि उसे ओवेरिअन कैंसर है। इसके बाद गुरुजी का सरकारी कार्यालयों और अस्पतालों में दर-दर भटकने का सिलसिला शुरू हो गया।

जिस व्यक्ति ने देश-विदेश में सम्मान पाया और छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया, उसे कहा गया 'क्या इलाज है और कितने रुपयों की जरूरत है, वह सब पहले डॉक्टर से लिखित में लेकर आओ।' अपनी बेटी कि जिंदगी बचाने कि आस में गुरुजी ने अपनी सारी जमापूंजी खर्च करके उसे वेल्लोर तो भेजा, लेकिन दो बार किमोथेरेपी करवाने में ही लाखों के कर्ज से लद गए।

मदद के नाम पर सरकार से मिले सिर्फ 30,000 रुपये और इस नाकाफी चंदे से जो इलाज अंबेडकर अस्पताल में चल रहा है, उसका हाल यह है कि मरीज की हालत बेहतर की जगह और बदतर हो गई है। उस पर तुर्रा ये कि अस्पताल प्रशासन उसे भर्ती करने में भी आनाकानी कर रहा है।

आज वृंदावती की हालत ऐसी है कि न वह कुछ खा पा रही है, न पी सकती है। अंबेडकर अस्पताल के कैंसर वार्ड में पड़ी वृंदावती ने बताया कि खून की जांच के लिए सुबह 6 बजे से कतार में लगने के बाद 12 बजे उसका नंबर आया।

ऑपरेशन के बाद उसे शारीरिक उत्सर्जन क्रियाएं करने में भी असुविधा महसूस हो रही है। उसके तीन छोटे बच्चे हैं, जिनकी अभी गुरुजी ही जिम्मेदारी उठा रहे हैं। इन बच्चों का पेट पालने, बेटी का इलाज करवाने और सर पर चढ़ा कर्ज उतारने की जद्दोजहद में लगे गोविंदलाल झारा कहते हैं, "अपनी सारी जिंदगी इस कला को देने के बाद आज मेरे पास चंद कागज के टुकड़ों के सिवाय और कुछ नहीं है।"

शिल्पगुरु नम आंखों से कहते हैं, "अगर वाकई इनका कोई मोल है तो ये कागज के टुकड़े अमानत के तौर पर रख लो और मुझे इतने पैसे दे दो कि अपनी बच्ची की जान बचा सकूं।" इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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