राधा को खुश करने के लिए श्रीकृष्ण ने धरा था गोपी रूप
नई दिल्ली। कृष्ण और राधा, प्रेम के अद्वितीय संसार के साथी , अनुपम बाल सखा और दुनिया को दिव्य प्रेम का संदेश देने वाले सच्चे प्रेमी। इस प्रेमी जोड़े ने दुनिया को प्रेम का दैवीय संदेश अवश्य दिया , किंतु स्वयं इनका प्रेम कैसा था ? बालपन की सौंधी खुशबू से महकता प्रेम , जिसमें खट्टी मीठी तकरार और बचपन की टांग खिंचाई भी उतनी ही प्रमुखता से मिली हुई थी।

आज ऐसे ही प्यार और तकरार भरी सुंदर कथा जानते हैं....
यह उस समय की बात है , जब कान्हा माखन चुराया करते थे। बाल गोपालों के संग गय्या चराया करते थे और अपने नटखटपन से सभी का मन लुभाया करते थे। वृंदावन की सभी माताएं यूं तो कान्हा को डांटा करती थीं पर अंतर्मन से स्वयं भी चाहती थी कि कृष्णा उनका माखन अवश्य चुराए, सभी माताएं एक दूसरे का मन जानती थी और झूठ मूठ का क्रोध दिखाने का आनंद लिया करती थी, लेकिन कोई एक था जो कृष्णा से सच में रुष्ट था, यह थी राधा रानी जो बरसाने की जान थी । वह कान्हा को मिल रहे इस प्रेम से जलती थी और चाहती थी कि माखन चुराने के बदले कान्हा को कोई दंड अवश्य दिया जाए।
राधा को खुश करने के लिए श्रीकृष्ण ने घरा गोपी रूप
वृंदावन की माताएं राधा की एक बाल सुलभ ईर्ष्या का भी भरपूर आनंद लेती थी। अंततः एक दिन उन्होंने राधा रानी का मन रख लिया। सब ने योजना बनाकर कृष्णा को माखन चुराते पकड़ लिया। बाकी टोली तो भाग गई पर कृष्ण तो स्वयं पकड़ा जाना चाहते थे , तो वे ना भागे। अब बालिका राधा का आनंद देखते ही बनता था। इस आनंद का पूरा सुख लेने के लिए माताओं ने राधिका को ही दंड निर्धारण का अधिकार दिया। फिर क्या था राधा रानी ने खूब सोच समझकर कृष्ण को गोपीका की तरह सज-धज कर नृत्य करने का दंड दे दिया । राधा को प्रसन्न करने के लिए कृष्ण भी जी भरकर सजे और पूरे मन से नाचे। आज कृष्ण भी प्रसन्न थे ,राधिका का मन भी खिल उठा था और वृंदावन में बह रही प्रेम की इस अनुपम बयार से कण कण सुगंधित हो उठा ।












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