Goddess Lakshmi: इस कहानी से जानिए लक्ष्मीजी कहां निवास नहीं करती

नई दिल्ली, 23 जुलाई। आजकल हर इंसान पैसों के पीछे भाग रहा है। कैसे भी करके वह खूब सारा पैसा कमा लेना चाहता है, लेकिन कड़ी मेहनत करने के बाद भी अनेक लोगों के हाथ खाली ही रह जाते हैं। मेहनत अपनी जगह है लेकिन किस्मत का साथ होना भी जरूरी है और आपके कर्म और संस्कार भी अच्छे होने चाहिए। महाभारत के शांतिपर्व में आई इस छोटी सी कहानी के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं कि लक्ष्मी किन घरों में रहती है और किन घरों से चली जाती है।

Goddess Lakshmi: इस कहानी से जानिए लक्ष्मीजी कहां निवास नहीं करती

एक दिन लक्ष्मीजी इंद्र के दरवाजे पर पहुंची और इंद्र से कहा किमैं तुम्हारे यहां निवास करना चाहती हूं। इंद्र ने आश्चर्य से कहा- हे माते आप तो असुरों के यहां बड़े आनंदपूर्वक रहती थी और आज बिना बुलाए मेरे द्वार पर पधारी हैं। इसका कारण मुझे समझाइए।

'कृपा करके उन त्रुटियों को मुझे विस्तार से बताएं'

लक्ष्मीजी ने कहा- इंद्र! कुछ समय पूर्व तक असुर बड़े धर्मात्मा थे। वे कर्तव्यपरायण रहते थे, परंतु उनके ये सद्गुण धीरे-धीरे नष्ट होने लगे। प्रेम के स्थान पर ईष्र्या, द्वेष और क्रोध-कलह का उनके परिवारों में निवास रहने लगा। इन दुर्गुणों। में भला मैं कैसे रह सकती हूं। मैंने सोचा किइस दूषित वातावरण में अब मेरा निर्वाह नहीं हो सकता इसलिए असुरों को छोड़कर तुम्हारे यहां चली आई हूं। इंद्र ने चकित होकर कहा- हे भगवती! जिन दुर्गुणों के कारण आपने असुरों को छोड़ा है, कृपा करके उन त्रुटियों को मुझे विस्तार से बताएं ताकिमैं सावधान रहूं और वे गलतियां न करूं।

'सत्कार, शिष्टाचार और अभिवादन करना वे भूल गए'

लक्ष्मी जी ने कहा- इंद्र! असुर लोग वृद्ध और गुरुजनों के सम्मान का विचार न कर उनकी बराबरी के आसन पर बैठने लगे थे। सत्कार, शिष्टाचार और अभिवादन करना वे भूल गए थे। लड़के माता-पिता से अशिष्ट भाषा में बात करते थे। शिष्य आचार्यो की बातों पर ध्यान नहीं देते थे। समाज की सारी मान-मर्यादाएं जाती रहीं। वे लोग सुपात्रों को दान और लंगड़े-लूले भिखारियों को भिक्षा न देकर धन को भोग-विलास में खर्च करने लगे। असुर लोग फलदार और छायादार वृक्षों को काटने लगे। दिन चढ़े तक सोते रहते थे। देर रात्रि तक खाते रहते थे। भक्ष्य और अभक्ष्य अन्न का विचार नहीं करते थे। खुद सत्कर्म नहीं करते और दूसरों को करते देख उनमें विध्न पैदा करते थे। स्ति्रयां श्रंगार, आलस्य और व्यसनों में व्यस्त रहने लगी। घर में अनाज का अनादर होने लगा। अन्न को चूहे खाकर नष्ट करने लगे। खाद्य पदार्थ खुले में पड़े रहते जिन्हें कुत्ते-बिल्ली चाटते। असुरों की प्रवृत्ति मादक द्रव्यों, जुए, मांस, नाच-तमाशों में बढ़ने लगी। उनके ऐसे आचरण देखकर मैं दुखी होकर उनके घर से चली आई। अब वहां दरिद्रता का निवास होगा।

'मैं परिश्रमी लोगों के यहां निवास करती हूं'

हे इंद्र! मैं परिश्रमी, मितव्ययी, जागरूक और नियमित उद्योग करते रहने वालों के यहां निवास करती हूं। जब तक तुम्हारा आचरण धर्मपरायण रहेगा, तब तक मैं तुम्हारे यहां बनी रहूंगी। हे इंद्र! संग्राम से पीछे न हटने वाले तथा विजय से सुशोभित रहने वाले शूरवीरों के शरीर में मैं सदा मौजूद रहती हूं। नित्य धर्माचरण करने वाले, परम बुद्धिमान, ब्राह्मण भक्त, सत्यवादी, विनयी तथा दानशील पुरुष में भी मैं सदा ही निवास करती हूं। सत्य और धर्म से बंधकर पहले मैं असुरों के यहां रहती थी। अब उन्हें धर्म के विपरीत देखकर मैंने तुम्हारे यहां रहना पसंद किया है।

मैं ऐसा कोई अधर्ममय आचरण नहीं करूंगा

इंद्र ने श्रद्धापूर्वक लक्ष्मीजी का अभिवादन किया और कहा मैं ऐसा कोई अधर्ममय आचरण नहीं करूंगा जिससे नाराज होकर आपको मेरे घर से जाना पड़े।

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