Holika Dahan 2022: क्या है होलिका दहन की कथा? क्यों पवित्र है होलिका की राख?
नई दिल्ली, 17 मार्च। आज होलिका दहन है, आज के दिन होलिका की अग्नि में लावा या नारियल फेंककर अपने और परिवार के लिए सुख, शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं तो वहीं कुुछ लोग होलिका की अग्नि में जौ फेंककर सभी नकारात्मक चीजों से छुटकारा पाने के लिए भी ऊपरवाले से गुहार लगाते हैं। दरअसल होली केवल प्रेम, उल्लास का त्योहार नहीं है बल्कि ये बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व भी है। मालूम हो कि इस बार को होलिका दहन बहुत ज्यादा खास है क्योंकि आज के दिन चार खास योग जैसे मृत योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, वृद्धि योग, ध्रुव योग और गुर्वादित्य योग बन रहे हैं।
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होलिका की राख को अपने मस्तक पर लगाते हैं
आपको बता दें कि होलिका दहन के दिन लोग होलिका की राख को अपने मस्तक पर लगाते हैं और ऐसा करने के पीछे कई कारण हैं, दरअसल ऐसा माना जाता है कि होलिका की राख माथे पर लगाने से इंसान को आर्थिक कष्ट से मुक्ति मिलती है तो वहीं उसकी तरक्की होती है और वो बहुत सारे निगेटिव चीजों से दूर रहता है।

कुछ लोग उपवास भी रखते हैं
यही नहीं होलिका की भस्म को घर में छिड़कने से भी इंसान के घर में सुख, शांति और समृद्दि का माहौल रहता है। कहीं-कहीं तो लोग होलिका -दहन होने तक उपवास भी रखते हैं।

होलिका की अग्नि जलते हुए शरीर की मानक है
तो वहीं किसी भी नवविवाहिता को होलिका की अग्नि को देखने से रोका जाता है क्योंकि होलिका की अग्नि जलते हुए शरीर की मानक है इसलिए नई नवेली दुल्हन को इस अग्नि से दूर रखने का प्रयास किया जाता इसे अशुभ मानते हैं और कहा जाता है कि अग्नि देखने से लोगों के वौवाहिक जीवन में दिक्कतें शुरू हो सकती हैं।

क्या है कहानी?
धार्मिक मान्यता है कि हिरण्यकश्यप का बेटा प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था लेकिन ये बात उसके पिता को अच्छी नहीं लगती थी इसलिए उसने प्रहलाद को बहुत सारे कष्ट दिए थे और कहा कि तुम मेरी पूजा करो लेकिन जब वो नहीं माना तो उसने उसे अपनी बहन होलिका की गोद में बैठाकर जिंदा जलाने की कोशिश की थी क्योंकि होलिका को ना जलने का वरदान मिला हुआ था लेकिन अग्नि में जाते ही वो जलकर भस्म हो गई और प्रहलाद जिंदा वापस निकल आया था। उस दिन फाल्गुन मास की पूर्णिमा थी, तभी से होलिका दहन किया जाता है। होलिका के साथ ऐसा उसके गलत इरादों की वजह से हुआ था इसी कारण इस पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाते हैं। आपको बता दें कि भगवान विष्णु ने बाद में नरसिंह का रूप धरकर हिरण्यकश्यप का वध किया था।












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