होली में भगवान राम को खींच लाये अमिताभ

दोस्तों होली का मतलब ही होता है उल्लास, मस्ती, शोर, खुशी..इसलिए तो जितना तवज्जो इस पर्व को हमारी फिल्मों में दिया गया है उतनी जगह बॉलीवुड में किसी भी त्योहार को नहीं मिली है। पुरानी हो या नयी फिल्में हर दौर में आपको होली के गीत मिलेंगे, हां यह जरूर है कि आज की फिल्मों की होली और कल की फिल्मों की होली को मनाने में काफी अंतर है। कल की फिल्मो की होली में शालिनता थी और आज की फिल्मों की होली में अश्लीलता। खैर यह एक अलग मुद्दा है जिस पर बाद में जिक्र किया जायेगा।
अपने गुरू और लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर श्री मुकुल कुमार श्रीवास्तव के लिखे कुछ आर्टिकल को पढ़ते हुए एक बड़ी ही गंभीर बात पर दिमाग गया और मन सोचने को मजबूर हुआ कि आखिर यह बात हमारे दिमाग में पहले क्यों नहीं आयी? शायद गुरू और चेले में यही अंतर होता है।
उन्होंने लिखा है कि जब भी होली के गीतों की बात होती है तो आंखों के सामने अमिताभ बच्चन अभिनित फिल्म 'सिलसिला' का गाया गीत..रंग बरसे.. और 'बागवां' फिल्म का ..होली खेले रघुबीरा... आ जाता है। दोनों ही गानों का कोई तोड़ नहीं है, दोनों ही बेहद लोकप्रिय और कर्णप्रिय हैं। जहां सिलसिला फिल्म का गाया गीत..एक प्रेमी की नशीली मुहब्बत को बयां करता है वहीं दूसरी ओर बागवां फिल्म का गीत अवध में राम की महिमा का बखान करता है जो वाकई में एक नयी और बड़ी बात है।
इससे पहले होली के गीतों में केवल ब्रज के कान्हा का जिक्र होता था। उनके खेले गये रास और गोपियों की मस्ती की बातें होती थीं। यही नहीं होली को हमेशा से भगवान कृष्ण का प्रसाद समझा जाता था लेकिन बागवां के इस गीत ने जता दिया कि ब्रज की ही तरह अवध में भी होली प्यार और मस्ती के साथ खेली जाती है।
वहां भी रंगो का मतलब हर्ष, उल्लास और छेड़-छाड़ से होता है। ब्रज में जहां लठ्ठमार होली का प्रचलन है वहीं अवध में पिचकारियों का चलन है। जहां ब्रज की होली सात दिन पहले चलती है वहीं अवध में भी सात दिनों तक यह त्योहार मनाया जाता है। जिसका श्रेय अमिताभ बच्चन को और बागवां फिल्म के डायरेक्टर रवि चोपड़ा को ही जाता है। कहना गलत ना होगा होली में भगवान राम को पर्दे पर खींच लाये अमिताभ बच्चन।












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