Holi 2026: क्यों मनाते हैं होली? क्या है रंग खेलने का सही वक्त? जानें हर सवाल का जवाब
Holi 2026: होली का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। यह हमेशा फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस बार 2 मार्च को पूर्णिमा थी लेकिन 3 मार्च को चंद्र ग्रहण लगा इसलिए इस दिन होली नहीं खेली गई बल्कि आज रंगों का त्योहार मनाया जा रहा है।
आपको बता दें कि होली को मस्ती और जोश को पर्व कहते हैं लेकिन क्या कभी आपने सोचा कि आखिर इसमें रंग क्यों खेला जाता है?

इस बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं, कहा जाता है कि नंदगांव में कृष्ण जी माता यशोदा से हमेशा कहते थे कि 'मैं इतना काला और राधा इतनी गोरी क्यों हैं' तो एक दिन मां ने कहा 'ये लो अबीर और सबको लगा दो, सबका रंग एक ही हो जाएगा', उसके बाद कान्हा जी ने सबको अबीर गुलाल लगा दिया, वो दिन था फाल्गुन मास की पूर्णिमा का, तब से ही इस दिन रंग खेला जाने लगा।
Holi 2026: 'रंग निगेटिव चीजों को दूर करते है'
तो वहीं कुछ लोगों का कहना है कि रंग निगेटिव चीजों को दूर करता है, भयकंर सर्दी के बाद मकर सक्रांति आती जरूर है लेकिन वातावरण में शांति रहती है रंग के जरिए उसी सूनापन को दूर किया जाता है और इसी वजह से होली पर रंग खेलते हैं। ज्योतिषियों के मुताबिक रंग खेलने का सही समय सुबह 8 बजे 12 बजे तक का है। दोपहर बाद रंग खेलने से निगेटिव चीजों का असर ज्यादा होता है इसलिए रंग हमेशा सुबह खेलना चाहिए। रंगों की होली आपसी प्रेम, भाईचारे और सद्भाव का प्रतीक है।
Holi 2026 Katha:कामदेव और भगवान शिव की पौराणिक कथा
होली केवल प्रह्लाद और होलिका की कथा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध कामदेव और भगवान शिव की पौराणिक कथा से भी जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि माता पार्वती भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या कर रही थीं। उस समय भगवान शिव गहन समाधि में लीन थे। देवताओं ने सोचा कि यदि शिव का विवाह पार्वती से होगा, तभी तारकासुर का वध संभव होगा। इसलिए देवताओं ने प्रेम के देवता कामदेव से अनुरोध किया कि वे शिव जी की तपस्या भंग करें।
रति ने किया था विलाप, कामदेव का हुआ था पुर्नजन्म
कामदेव ने वसंत ऋतु में अपने पुष्प बाण (फूलों के तीर) शिव पर चलाए। जैसे ही शिव जी की समाधि भंग हुई, उन्हें क्रोध आ गया और उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। उनके तेज से कामदेव भस्म हो गए। कामदेव की पत्नी रति के विलाप से भगवान शिव का हृदय पिघल गया। उन्होंने कामदेव को फाल्गुन पूर्णिमा को फिर से जीवित किया था, जिसकी खुशी में रंग खेले गए थे तब से ही होली पर रंग खेलने की परंपरा बन गई।
DISCLAIMER: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। वनइंडिया लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी चीज को अमल लाने के लिए किसी ज्योतिषी और किसी पंडित से अवश्य बातें करें। हमारा मकसद किसी भी तरह का अंधविश्वास फैलाना नहीं है।
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