Ganesha Chaturthi 2020: मूषक राज ने करवाया था भगवान गणेश का विवाह
नई दिल्ली। विवाह जीवन का एक ऐसा पड़ाव है, जिसके सपने हर युवा देखता है। वास्तव में विवाह है ही इतना सुंदर विधान,जिसका आकर्षण होना बहुत ही स्वाभाविक है। विवाह हमें हमारे उस साथी से मिलवाता है, जो जीवन भर हर सुख-दुख में साथ निभाता है। विवाह के बाद भिन्न स्थानों से आए हुए दो व्यक्ति एक समान जीवन जीते हैं और आनंद का उपभोग करते हैं। यही कारण है कि किसी कारणवश जिनका विवाह नहीं हो पाता, वे व्यक्ति अवसाद में चले जाते हैं और जीवन से निराश हो जाते हैं। यह हम साधारण मनुष्यों की ही बात नहीं है, स्वयं विघ्नहर्ता गणपति को इस समस्या का सामना करना पड़ा था।

इस संकट से उन्हें उबारा था उनके परम प्रिय मूषक राज ने। कैसे, आज की कथा से जानते हैं...
यह उस समय की बात है, जब गणपति भगवान विष्णु की आराधना पूर्ण कर चुके थे और युवावस्था में पहुंच गए थे। इस आयु में आकर उनके मन में भी स्वाभाविक रूप से विवाह की ललक जागी। अब यहां उनका गज स्वरूप आड़े आ गया। कोई भी युवती उनके गजमुख के कारण उनकी पत्नी बनना नहीं चाहती थी। अनेक बार प्रयास करने के बाद भी जब बात ना बनी, तब गणेश जी उदास हो गए। अब स्वर्ग में किसी का भी विवाह हो, तो उनका दिल बैठ जाता था। उनकी यह उदासी उनके वाहन और परम सखा मूषकराज से ना देखी गई। उन्होंने अपनी क्षमता के अनुरूप दिमाग चलाया और जब, जहां विवाह हो, वहां जाकर सारी वस्तुएं काटना प्रारंभ कर दिया। देखते- ही- देखते मूषकराज का आतंक संपूर्ण स्वर्ग पर छा गया। गणपति का प्रिय होने से कोई उन्हें नुकसान पहुंचाने की सोच भी नहीं सकता था।
देवता मूषकराज की शिकायत लेकर शिव- पार्वती के पास गए
जब विवाह समारोहों में नुकसान किसी भी तरह ना रूका, तो देवता मूषकराज की शिकायत लेकर शिव- पार्वती के पास गए। शिव जी जानते थे कि तुलसी के श्राप के कारण गणपति का विवाह आसानी से, विधिवत् ना हो पाएगा। तुलसी के श्राप का मान रखने के लिए शिव जी ने सबको ब्रह्मा जी के पास जाने को कहा। सभी देवता ब्रह्मा जी की शरण में पहुंचे और मूषकराज की शिकायत की। ब्रह्मा जी ने मूषकराज को बुलाकर उनके व्यवहार का कारण पूछा, तो उन्होंने बताया कि विवाह ना होने से मेरे गणपति दुखी हैं। जब तक वे सुखी नहीं हो जाते, मैं किसी का विवाह शांति से नहीं होने दूंगा।
रिद्धि और सिद्धि से हुआ गणेश जी का विवाह
मूषकराज और गणपति की समस्या जानकर ब्रह्मा जी ने तुरंत अपनी माया से दो कन्याओं रिद्धि और सिद्धि की रचना की और गणेश जी को विवाह के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने वहीं तुरंत ही दोनों कन्याओं से गणेश जी का विवाह करा दिया। इस तरह तुलसी का श्राप पूरा हुआ कि आपका विवाह अचानक, आपकी इच्छा के विरूद्ध, अनजाने में होगा। इसके बाद गणेश जी और मूषकराज दोनों प्रसन्न हो गए और स्वर्ग का आतंक समाप्त हुआ।












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