Diwali 2021: जानिए दीपावली की परंपरा और इससे जुड़ी एक कथा

नई दिल्ली, 29 अक्टूबर। कार्तिक माह की अमावस्या के दिन दीपों का पर्व दीपावली मनाया जाता है। इस दिन लक्ष्मी का पूजन करने के लिए कई दिन पूर्व से तैयारियां प्रारंभ हो जाती है। घर की साफ-सफाई करके पुताई की जाती है और घर को रंग-बिरंगी रोशनियों से सजाया जाता है। कार्तिक अमावस्या से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण बातें हैं। जैसे इस दिन भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे। अयोध्यावासियों ने श्रीरामचंद्र के लौटने की खुशी में दीपमालाएं सजाकर महोत्सव मनाया था। इस दिन उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य का राजतिलक भी हुआ था। विक्रमी संवत का आरंभ भी तभी से माना जाता है। आज के दिन व्यापारी अपने बही खाते बदलते हैं तथा लाभ-हानि का ब्योरा तैयार करते हैं।

जानिए दीपावली की परंपरा और इससे जुड़ी एक कथा

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    लक्ष्मीजी की कथा

    एक साहूकार था। उसकी बेटी प्रतिदिन पीपल के पेड़ में जल चढ़ाने जाती थी। उस पीपल पर लक्ष्मीजी का वास था। एक दिन लक्ष्मीजी से साहूकार की बेटी से कहा तुम मेरी सहेली बन जाओ। उसने लक्ष्मीजी से कहा मैं कल अपने पिता से पूछकर उत्तर दूंगी। पिता को जब बेटी ने बताया किपीपल के पेड़ पर एक स्त्री मुझे अपनी सहेली बनाना चाहती है तो पिता ने हां कर दी। दूसरे दिन साहूकार की बेटी ने लक्ष्मीजी को अपनी सहेली बनाना स्वीकार कर लिया।

    लक्ष्मीजी साहूकार की बेटी को अपने घर ले गई

    एक दिन लक्ष्मीजी साहूकार की बेटी को अपने घर ले गई। लक्ष्मीजी ने उसे ओढ़ने से शाल दुशाला दिया तथा सोने की बनी चौकी पर बैठाया। सोने की थाली में उसे अनेक प्रकार के व्यंजन खाने को दिए। जब साहूकार की बेटी खा-पीकर अपने घर जाने लगी तो लक्ष्मीजी बोली तुम मुझे अपने घर कब बुला रही हो। पहले तो साहूकार की पुत्री आनाकानी करने लगी फिर तैयार हो गई। घर जाकर वह रूठकर बैठ गई। साहूकार बोला तुम लक्ष्मीजी को अपने घर आने का निमंत्रण दे आई हो फिर उदास क्यों बैठी हो। तब बेटी बोली- लक्ष्मीजी ने तो मुझे इतना दिया और बहुत सुंदर भोजन कराया। मैं उन्हें किस प्रकार खिलाऊंगी। हमारे घर में तो उनकी अपेक्षा कुछ भी नहीं है।

    गोबर मिट्टी से चौका लगाकर सफाई कर दें

    तब साहूकार ने कहा अपने से जो बनेगा उसी से सत्कार कर देंगे। तू फौरन गोबर मिट्टी से चौका लगाकर सफाई कर दें। चौमुखा दीपक बनाकर लक्ष्मीजी का नाम लेकर बैठ जा। उसी समय एक चील कहीं से नौलखा हार उनके आंगन में डाल गई। साहूकार की बेटी ने उस हार को बेचकर सोने की चौकी, सोने का थाल, शाल दुशाला और अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजन की तैयारी कर ली।

    साहूकार की बेटी ने बैठने के लिए सोने की चौकी दी

    थोड़ी देर बाद गणेशजी और लक्ष्मीजी उसके घर आ गए। साहूकार की बेटी ने बैठने के लिए सोने की चौकी दी तो लक्ष्मी ने उस पर बैठने से मना करते हुए कहा कि इस पर तो राजा रानी बैठते हैं। तब साहूकार की बेटी ने लक्ष्मीजी को अनुरोध करके उस पर जबर्दस्ती बिठा दिया। उसने लक्ष्मीजी और गणेशजी की खूब खातिरदारी की। इससे लक्ष्मीजी प्रसन्न हुई और उनकी कृपा से साहूकार बहुत धनवान बन गया।

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