Chanakya Niti: 'जो मिला है उसे संभालें'
स्तार से समझें तो ज्यादातर मनुष्य उन लालसाओं, कामनाओं, आकांक्षाओं के पीछे भागते रहते हैं जिनका पूरा होना संभव नहीं है।

Chanakya Niti: 'जो मिला है उसे संभालें'
- यो ध्रुवाणि परित्यज्य हृाध्रुवं परिसेवते ।
- ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति चाध्रुवं नष्टमेव तत ।।
अर्थात्- जो मनुष्य निश्चित को छोड़कर अनिश्चित का सहारा लेता है उसका निश्चित भी नष्ट हो जाता है। अनिश्चित तो स्वयं नष्ट होता ही है।
भारतीय जनमानस में एक मुहावरा बड़ा चर्चित रहता है- आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी रहे न पूरी पावे। इसका अर्थ यह है कि जो मनुष्य अपनी आधी सुख-सुविधाओं को छोड़कर संपूर्ण पानी की लालसा में दौड़ता है, उसके हाथ से कई बार आधी सुविधाएं भी छूट जाती हैं और पूरी भी नहीं मिल पाती हैं।
आचार्य चाणक्य कहते है जिस वस्तु का मिलना पक्का है पहले उसे प्राप्त कर लेना चाहिए या उसी काम को पहले कर लेना चाहिए। ऐसा न करके जो मनुष्य अनिश्चित अर्थात् ऐसे काम करने दौड़ता है जिनके पूरा होने में संदेह है तो उसका पका-पकाया काम भी उससे छूट सकता है और मिलने वाली वस्तु या होने वाला काम भी नहीं हो पाता है। इस प्रकार दोनों तरफ से उसके हाथ रिक्त रह जाते हैं। आचार्य संकेत करते हैं अनिश्चित का विश्वास करना मूर्खता है। उसे नष्ट ही समझना चाहिए या जो निश्चित नहीं है वह नष्ट के समान ही है।
उदाहरण से समझें तो कई पुरुष अपनी सुशीला, सुलक्षणा, सुनयना पत्नी को छोड़कर अन्य स्त्रियों के पीछे भागते रहते हैं, जो घर में आपको प्राप्त है, उसका सम्मान करें, उसकी इच्छा पूर्ति करें, उसके सुख-सुविधाओं का ध्यान रखें, जो प्राप्त नहीं है उसके पीछे दौड़ना मूर्खता है। ऐसा लंपट पुरुष अपनी स्त्री को भी खो बैठता है। इसलिए जीवन में जो भी प्राप्त है, ईश्वर ने आपको जो दिया है उसका सम्मान करना सीखें, उसे सहेजना सीखें तभी जीवन सार्थक है, अन्यथा झूठे सुख के पीछे जीवनभर भागने से भी कुछ हासिल नहीं होगा।












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