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बद्रीनाथ धाम में होती है 'पंच बद्री' की पूजा, जानिए खास बातें

नई दिल्ली। 15 मई को सुबह 4:30 बजे बद्रीनाथ के कपाट खोल दिए गए हैं,मालूम हो कि अलकनंदा नदी के किनारे स्थित यह हिंदू धर्म के चार धामों में शामिल है, यहां भगवान विष्णु 6 माह निद्रा में रहते हैं और 6 माह जागते हैं, बद्रीनाथ मंदिर को बद्रीनारायण मंदिर भी कहते हैं, जो कि अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है, यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बद्रीनाथ को समर्पित है, यहां अखण्ड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है।

 बद्रीनाथ, भगवान विष्णु का वास

बद्रीनाथ, भगवान विष्णु का वास

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह 12 धाराओं में बंट गई। इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई और यह स्थान बद्रीनाथ, भगवान विष्णु का वास बना।

आदि शंकराचार्य ने कराया था मंदिर का निर्माण

आदि शंकराचार्य ने कराया था मंदिर का निर्माण

भगवान विष्णु की प्रतिमा वाला वर्तमान मंदिर 3,133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने इसका निर्माण कराया था। बद्नीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी।

'पंच बद्री'

बद्रीनाथ धाम में भगवान के 5 स्वरूपों की पूजा की जाती है। विष्णुजी के इन पंच स्वरूपों को 'पंच बद्री' कहा जाता है। बद्रीनाथ के मुख्य मंदिर के अलावा यहां पर अन्य 4 स्वरूपों के मंदिर भी हैं। श्री विशाल बद्री पंच स्वरूपों में मुख्य हैं।

 'मूर्ति का मेला'

'मूर्ति का मेला'

बद्रीनाथ मंदिर में आयोजित सबसे प्रमुख पर्व माता 'मूर्ति का मेला' है, जो मां पृथ्वी पर गंगा नदी के आगमन की खुशी में मनाया जाता है। इस त्यौहार के दौरान 'बद्रीनाथ' की माता की पूजा की जाती है, माना जाता है कि, पृथ्वी के प्राणियों के कल्याण के लिए नदी को बारह धाराओं में विभाजित कर दिया था। जिस स्थान पर यह नदी तब बही थी, वही आज बद्रीनाथ की पवित्र भूमि बन गई है। बद्री केदार यहां का एक अन्य प्रसिद्ध त्यौहार है, जो जून के महीने में बद्रीनाथ और केदारनाथ, दोनों मंदिरों में मनाया जाता है। यह त्यौहार आठ दिनों तक चलता है, और इसमें आयोजित समारोह के दौरान देश-भर से आये कलाकार यहां प्रदर्शन करते हैं।

विष्णु पुराण में नर और नारायण का जिक्र

विष्णु पुराण में नर और नारायण का जिक्र

विष्णु पुराण में इस क्षेत्र से संबंधित एक अन्य कथा है, जिसके अनुसार धर्म के दो पुत्र हुए- नर और नारायण, जिन्होंने धर्म के विस्तार हेतु कई वर्षों तक इस स्थान पर तपस्या की थी। अपना आश्रम स्थापित करने के लिए एक आदर्श स्थान की तलाश में वे वृद्ध बद्री, योग बद्री, ध्यान बद्री और भविष्य बद्री नामक चार स्थानों में घूमे। अंततः उन्हें अलकनंदा नदी के पीछे एक गर्म और एक ठंडा पानी का चश्मा मिला, जिसके पास के क्षेत्र को उन्होंने बद्री विशाल नाम दिया।

पांडवों ने किया था पितरों का पिंडदान

यह भी माना जाता है कि व्यास जी ने महाभारत इसी जगह पर लिखी थीऔर नर-नारायण ने ही क्रमशः अगले जन्म में क्रमशः अर्जुन तथा कृष्ण के रूप में जन्म लिया था।महाभारतकालीन एक अन्य मान्यता यह भी है कि इसी स्थान पर पांडवों ने अपने पितरों का पिंडदान किया था, इसी कारण से बद्रीनाथ के ब्रम्हाकपाल क्षेत्र में आज भी तीर्थयात्री अपने पितरों का आत्मा का शांति के लिए पिंडदान करते हैं।

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