Amalaka Ekadashi 2021: सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला व्रत है आमलकी एकादशी, जानिए कथा
नई दिल्ली। फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी या रंगभरी एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह एकादशी 25 मार्च 2021 गुरुवार को आ रही है। आमलकी एकादशी का व्रत जीवन के चारों पुरुषार्थो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाला कहा गया है। अर्थात यह जीवन को धर्म के मार्ग पर चलाने के साथ धन संपत्ति और उत्तम वैवाहिक-दांपत्य सुख भी प्रदान करती है। इसके साथ ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष भी आमलकी एकादशी व्रत करके पाना आसान हो जाता है।

कैसे करें आमलकी एकादशी की पूजा
- आमलकी एकादशी के दिन भगवान विष्णु-लक्ष्मी का विधिवत पूजन किया जाता है। व्रत करके दिनभर निराहार रहा जाता है। पूजा में इस एकादशी के व्रत की कथा जरूर पढ़ें या सुनें।
- इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करने का विधान भी है। इस वृक्ष की जड़ में ताजे जल में कच्चा दूध और मिश्री मिलाकर अर्पित करें। इससे स्ति्रयों के सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है।
- महाशिवरात्रि और होली के बीच आने वाली इस एकादशी को रंगभरी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती को अबीर-गुलाल लगाकर उनके साथ होली खेलें। इससे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- इस एकादशी के दिन शिवजी की पूजा का भी महत्व है। इस एकादशी का व्रत रखें और भगवान विष्णु और शिव के मंत्रों का निरंतर जाप करते रहें।
- इस दिन किसी विष्णु मंदिर में जाकर गाय के शुद्ध घी से बना भोग विष्णुजी को लगाएं। मां लक्ष्मी को लाल गुलाब और मिश्री नैवेद्य में अर्पित करें। इससे अतुलनीय धन-संपदा प्राप्त होगी।
आमलकी एकादशी व्रत की कथा
राजा मान्धाता के पूछने पर ऋषि वशिष्ठ ने आमलकी एकादशी व्रत का माहात्म्य बताते हुए कहा- यह व्रत फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन होता है। इस व्रत के फल से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत का पुण्य एक हजार गोदान के फल के बराबर है। आमलकी (आंवले) की महत्ता उसके गुणों के अतिरिक्त इस बात में भी है किइसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के श्रीमुख से हुई है। प्राचीन समय में वैदिक नामक एक नगर था। उस नगर में सभी लोग प्रसन्नतापूर्वक रहते थे। उस नगर में चैत्ररथ नामक चंद्रवंशी राजा राज्य करता था। वह उच्चकोटि का विद्वान तथा धार्मिक प्रवृत्ति का राजा था। उस राज्य के सभी लोग विष्णु भक्त थे। वहां के छोटे-बड़े सभी निवासी प्रत्येक एकादशी का उपवास करते थे।
आनंदपूर्वक एकादशी का व्रत किया
एक बार फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आई। उस दिन राजा और प्रत्येक प्रजाजन, वृद्ध से लेकर बालक तक ने आनंदपूर्वक एकादशी का व्रत किया। राजा अपनी प्रजा के साथ मंदिर में आकर कलश स्थापित करके धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न, छत्र आदि से धात्री का पूजन करने लगा। उस मंदिर में रात को सभी ने जागरण किया। रात के समय उस जगह एक बहेलिया आया। वह महापापी तथा दुराचारी था। अपने कुटुंब का पालन वह जीव हिंसा करके करता था। वह भूख-प्यास से अत्यंत व्याकुल था। भोजन पाने की इच्छा से वह मंदिर के एक कोने में बैठ गया। उस जगह बैठकर वह भगवान विष्णु की कथा तथा एकादशी माहात्म्य सुनने लगा। इस प्रकार उस बहेलिए ने सारी रात अन्य लोगों के साथ जागरण कर व्यतीत की। प्रात:काल सभी लोग अपने-अपने निवास पर चले गए। वह बहेलिया भी अपने घर चला गया और वहां जाकर भोजन किया।
धार्मिक, सत्यवादी, कर्मवीर और विष्णुभक्त
कुछ समय बाद बहेलिए की मृत्यु हो गई। उसने जीव हिंसा की थी, इस कारण वह घोर नरक का भागी था, परंतु उस दिन आमलकी एकादशी का व्रत तथा जागरण के प्रभाव से उसने राजा विदुरथ के यहां जन्म लिया। उसका नाम वसुरथ रखा गया। बड़ा होने पर वह चतुरंगिणी सेना सहित तथा धन-धान्य से युक्त होकर दस सहस्त्र ग्रामों का संचालन करने लगा। वह तेज में सूर्य के समान, कांति में चंद्रमा के समान, वीरता में भगवान विष्णु के समान तथा क्षमा में पृथ्वी के समान था। वह अत्यंत धार्मिक, सत्यवादी, कर्मवीर और विष्णुभक्त था।
डाकू राजा पर टूट पड़े और हथियारों से प्रहार करने लगे
एक बार राजा वसुरथ शिकार खेलने गया। वह वन में रास्ता भटक गया और दिशा का ज्ञान न होने के कारण उसी वन में एक वृक्ष के नीचे सो गया। रात में वहां डाकू आए और राजा को अकेला देखकर वसुरथ की ओर दौड़े। वे राजा को पहचान गए। वह डाकू कहने लगे कि इस दुष्ट राजा ने हमारे माता-पिता, पुत्र-पौत्र आदि समस्त संबंधियों को मारा है तथा देश से निकाल दिया। अब हमें इसे मारकर अपने अपमान का बदला लेना चाहिए। वे डाकू राजा पर टूट पड़े और हथियारों से प्रहार करने लगे। डाकू आश्चर्यचकित, क्योंकिउनके हथियारों का राजा पर कोई असर नहीं हो रहा था। हथियारों के वार राजा के लिए फूलों के समान होते जा रहे थे। कुछ समय पश्चात वे हथियार पलटकर डाकुओं पर ही प्रहार करने लगे।
आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव
उसी समय राजा के शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुई। वह देवी अत्यंत सुंदर थी तथा सुंदर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत थी। उसकी भृकुटी टेढ़ी थी। उसकी आंखों से क्रोध की भीषण लपटें निकल रही थीं। उसने देखते-ही-देखते उन सभी डाकुओं का समूल नाश कर दिया। नींद से जागने पर राजा ने वहां अनेक डाकुओं को मृत देखा। वह सोचने लगा किसने इन्हें मारा? इस वन में कौन मेरा हितैषी रहता है? राजा वसुरथ ऐसा विचार कर ही रहा था कितभी आकाशवाणी हुई_ 'हे राजन! इस संसार मे भगवान विष्णु के अतिरिक्त तेरी रक्षा कौन कर सकता है!' इस आकाशवाणी को सुनकर राजा ने भगवान विष्णु को स्मरण कर उन्हें प्रणाम किया, फिर अपने नगर को वापस आ गया और सुखपूर्वक राज्य करने लगा। महर्षि वशिष्ठ ने कहा- हे राजन! यह सब आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव था, जो मनुष्य एक भी आमलकी एकादशी का व्रत करता है, वह प्रत्येक कार्य में सफल होता है और अंत में वैकुंठ धाम को पाता है।
आमलकी एकादशी कब से कब तक
- एकादशी तिथि प्रारंभ 24 मार्च को प्रात: 10.24 बजे से
- एकादशी तिथि पूर्ण 25 मार्च को प्रात: 9.47 बजे तक
- एकादशी का पारणा 26 मार्च को प्रात: 6.25 से 8.21 बजे तक












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