सैर एक ऐसी दुनिया की, जहाँ कोई मरता नहीं!
अहमदाबाद। मन से अनुभव की जाने वाली और आँखों से दिखने वाली इस विशाल दुनिया में हर क्षण करोड़ों जीव जन्म लेते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं। पैदा होने वाले को नहीं मालूम कि वह कहाँ आया है और क्या करने वाला है, तो मृत्यु की ओर बढ़ता हर जीव मृत्यु के भय से भयभीत है। जन्म लेने के बाद और मृत्यु के बारे में जानने के बाद हर जीव की एक ही आकांक्षा होती है कि किसी भी तरह मौत टलती जाए और इसके लिए वह प्रयास करता ही रहता है। फिर वह अमीर हो या गरीब, दोनों अपनी-अपनी समर्थता के मुताबिक मृत्यु को टालने की कोशिशें करते हैं। हालाँकि सर्वस्थापित सत्य यही है कि मृत्यु टलती नहीं है।
परंतु... परंतु... परंतु... क्या इस दुनिया के भीतर ही कोई ऐसी दुनिया है, जहाँ कोई मरता न हो? आपको लगेगा कि ये क्या कह रहे हैं हम। दुनिया एक ही है और वह गोल है तथा उसमें निरंतर तमाम जीव यानी प्राण लेने वाले तमाम प्राणी पल-पल मृत्यु की ओर सरक रहे हैं। हर जीव, चाहे वह जानता हो या न जानता हो, परंतु उसकी मृत्यु निश्चित है, ये हम सब जानते हैं। अरे जीव तो क्या, सृष्टि में मौजूद प्रत्येक जड़ वस्तु भी एक न एक दिन नष्ट होने ही वाली है। तो ऐसे में ऐसी तो कौन-सी दुनिया है, जहाँ कोई मरता नहीं?
धीरज... धीरज... धीरज... यहाँ आपको ऐसी दुनिया जरूर बताई जाएगी, लेकिन इस अमरलोक के बारे में जानने से पहले हमें कुछ प्रश्नों के उत्तर खोजने होंगे और विश्वास के साथ कहता हूँ कि इन प्रश्नों के उत्तर खोजते-खोजते हम उस अमरलोक तक जरूर पहुँच जाएँगे।
सबसे पहला प्रश्न यह खड़ा होता है कि जिसे ऐसे अमरलोक की तलाश हो, उसे सबसे पहले तो यह जानना चाहिए कि इस दुनिया में मरता कौन है? एक आम आदमी का जवाब सीधा-सादा यही होगा कि हर व्यक्ति मरता है, हर जीव मरता है, हर प्राणी मरता है, परंतु इन उत्तरों को सही उत्तर कैसे कहा जा सकता है? ये उत्तर सही नहीं हैं। इसे हम एक उदाहरण द्वारा सिद्ध भी कर सकते हैं।
मान लीजिए कि आपको यह खबर मिलती है कि आपके एक मित्र जीवन की मृत्यु हो गई। यह खबर सुनते ही आपकी आँखों के समक्ष जीवन पूर्णतः साकार हो आता है। आप जीवन को जब से जानते हैं, तब से लेकर अब तक के उसके साथ के तमाम प्रसंग आपकी आँखों सामने घूम जाते हैं। आप जीवन के घर पहुँचे और देखा कि जो जीवन आपकी आँखों के समक्ष साकार हुआ है, वह हुबहू धरती पर लेटा हुआ है। फिर भी मन मानने को तैयार नहीं है कि जीवन जिंदा है। जिस जीवन का साकार स्वरूप आप पूरी जिंदगी देखते आए और उसी के साथ तमाम व्यवहार करते आए, वह तो अब भी लेटा हुआ है। फिर भी मन क्यों नहीं मानता कि जीवन जिंदा है।
आखिर ऐसा तो क्या चला गया कि अब जीवन का पूरा शरीर साबूत होने के बावजूद हम जीवन को ‘है' मानने को तैयार नहीं हैं? फिर तो इसका ये मतलब हुआ कि जिस जीवन को हम शरीर के रूप में पूरी जिंदगी देखते रहे, वह असली जीवन था ही हीं! और यदि जीवन का शरीर जीवन नहीं था, तो फिर जीवन कौन था? इस प्रश्न का उत्तर एक तरह से देखें, तो बिल्कुल सीधा-सादा और सरल है। वास्तव में जीवन किसी शरीर को नहीं कहा जा रहा था। उस शरीर में रहे चेतन को कहा जा रहा था।
आइए तसवीरों के साथ जानते हैं कि आखिर मरता कौन है?

शरीर मरता नहीं
अध्यात्म की ऊँचाई से देखें, तो कहा जाता है कि समग्र सृष्टि में उत्पन्न होने या नष्ट होने जैसा कुछ भी नहीं है। आम बोलचाल में हम लोगों को सांत्वना दिया करते हैं कि शरीर मरता है, आत्मा नहीं, परंतु अध्यात्म की उच्च अवस्था से सोचें, तो समझ में आएगा कि शरीर भी मरता नहीं है। शरीर पाँच भूत का बना हुआ है और वह अपने निर्माण के साथ ही विनाश की ओर अग्रसर होने लगता है। इस प्रकार शरीर जिन पाँच भूतों से बना था, उसी में जाकर विनी हो जाता है। वह मरता नहीं है।

आत्मा मरता नहीं
अब अगर शरीर नहीं मरता, तो फिर मरता है कौन? क्या उस आत्मा की मृत्यु होती है, जिसकी चेतना से शरीर संचालित होता है? वेदांत के सिद्धांत और गीता में जगद्गुरु श्री कृष्ण परमात्मा के अनुसार आत्मा कभी मरता नहीं है। आत्मा कुछ करता या कराता नहीं है। वह मात्र साक्षी है। जिस प्रकार सूर्य मात्र प्रकाश देता है। उसका इस बात से कोई सम्बंध नहीं है कि उसके प्रकाश तले कौन पाप करता है और कौन पुण्य, लेकिन उसके प्रकाश के बिना पाप या पुण्य संभव नहीं है। इसी प्रकार आत्मा कुछ करता या कराता नहीं है, परंतु उसकी उपस्थिति के बिना कुछ भी संभव नहीं है। इस तरह आत्मा भी मरता नहीं है।

तो मन क्या है?
अब दो बातें तो स्पष्ट हो गईं कि शरीर मरता नहीं है और आत्मा भी मरता नहीं है। प्रश्न अब भी खड़ा है कि आखिर मरता कौन है? अब एक और परिबल के बारे में जानते हैं। यह महत्वपूर्ण परिबल है मन। आत्मा साक्षी है और शरीर माध्यम, परंतु इस माध्यम को क्रियाशील करता है मन। आधुनिक शिक्षा पद्धति में मन शब्द का उल्लेख शायद ही मिलता है, परंतु हमारे शास्त्र मन शब्द से अटे पड़े हैं। यह मन ही है, जो हमें कर्म करने को प्रेरित करता है। हमारी अंदर इच्छाएँ और वासनाएँ पैदा करता है मन।

मन ही तो संसार है
शरीर की तमाम इन्द्रियों को उसके विषयों में रुचि तभी पैदा होती है, जब उससे मन का लगाव हो। उदाहरण के तौर पर हम किसी विवाह समारोह में मजेदार व्यंजन का स्वाद ले रहे हों। तभी अचानक जानकारी मिले कि आपके निकटस्थ परिजन की मृत्यु हो गई। यह खबर मिलते ही आपका भोजन से स्वाद उड़ जाएगा, क्योंकि आपका मन उस परिजन की ओर रुख कर चुका है। इस तरह देखें, तो हमारा जगत हमारा मन ही है। जहाँ मन होता है, वहीं जगत होता है।

मन भी नहीं मरता!
अब हम मूल मुददे पर आते हैं। ये मन ही है, जो हमारे शरीर और आत्मा को अलग करता है। वह इच्छाएँ करता रहता है और हमें लगता है कि हमारी आत्मा तृप्त हो रही है। मन की इच्छाओं का कभी अंत नहीं होता और एक दिन यह शरीर जीर्ण होकर पंचमहाभूत में विलीन हो जाता है, परंतु मन तो अब भी मौजूद है। उसकी अधूरी इच्छाएँ पर्ण करने के लिए वह सूक्ष्म स्वरूप धारण करता है। उसे सूक्ष्म मन या सूक्ष्म शरीर कहते हैं और जैसे ही वह हमारा जीर्ण शरीर छोड़ता है, तुरंत वह अपनी इच्छाएँ पूर्ण करने योग्य योनि में दाखिल हो जाता है। इस प्रकार देखें, तो मन भी नहीं मरता।

मरता है अहंकार
तो सवाल वही पैदा होता है कि मरता है कौन? तो चलिए, अब आपको बता ही देते हैं कि मरता है कौन? मरता है हमारा अहंकार। अहंकार की व्याख्या को लेकर आम जगत में भारी भ्रांतियाँ हैं। लोगों को लगता है कि हमें दौलत का अहंकार नहीं है, हमे पद का अहंकार नहीं है, हमें जाति या कुल का अहंकार नहीं है, अतः हम निरंकारी-अहंकाररहित हो गए। अहंकार की सच्ची व्याख्या जाननी हो, तो अहंकार के शाब्दिक अर्थ पर गौर करना होगा। अहंकार अर्थात् अहम्+कार अर्थात् मैं हूँ। एक देहधारी प्राणी के रूप में सबको इस बात का अहंकार तो है ही कि मैं फलाँ व्यक्ति, फलाँ नामधारी, फलाँ कुलधारी, फलाँ पदधारी या फलाँ उपाधिधारी व्यक्ति हूँ। बस जब भी मृत्यु होती है, तब इस अहम्+कार की ही मृत्यु होती है।

वो मारे, उससे पहले हम मार दें
ऐसी मृत्यु से उबरने का एक ही मार्ग है और वह है आत्म ज्ञान। जो व्यक्ति यह बात जान लेता है कि वह शरीर नहीं है, वह शुद्ध आत्मा है और मात्र साक्षी है, वही देहाभिमान से मुक्त हो सकता है और जो देहाभिमान से मुक्त हो जाता है, वह निश्चित रूप से इसी भव और इसी दुनिया में अपना अमरलोक स्थापित कर सकता है, क्योंकि वह अब जान चुका है कि उसका शरीर नहीं मरता, आत्मा भी नहीं मरता और मन भी नहीं मरता। मात्र अहंकार ज मरता है। यदि हम शरीर रूपी मृत्यु के भय से उबरना चाहते हैं, तो इस अहंकार यानी देहाभिमान का हमें आत्म ज्ञान द्वारा वध करना होगा और वो हमें मारे, उससे पहले उसे मार देना होगा।












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