यूपी की तर्ज पर उत्तराखंड में भी उपभोक्ताओं को चीनी देने की मांग
हल्द्वानी। खाद्य आपूर्ति विभाग और सरकारी सस्ता गल्ला विक्रेताओं में सरकारी दाल को लेकर मनमुटाव वाली स्थिति बनी हुई है। गोदामों से जबरन उठवाकर सरकारी सस्ता गल्ला की दुकानों में रखवाई जा रही क्विंटलों दाल एक्सपायरी डेट की कगार पर पहुंच गई है। इस बर्बादी को रोकने के लिए अब पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की तर्ज पर दाल की जगह प्रत्येक उपभोक्ता को रियायती दर पर चीनी दिए जाने की मांग उठने लगी है। यह मांग कोई और नहीं बल्कि खुद सस्ता गल्ला विक्रेताओं ने उठाई है। उनका कहना है कि दाल खराब होने से बेहतर है उपभोक्ताओं को 18.50 रुपए के हिसाब चीनी दी जाए।

रामनगर में अब भी गोदाम में डंप दाल
सरकार की ओर से दी जा रही दाल की गुणवत्ता और कीमतों पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। जहां उपभोक्ता इस दाल को सस्ते गल्ले की दुकानों से खरीदने को तैयार नहीं हैं वहीं, विक्रेताओं ने भी दाल गोदामों से उठाने से मना कर दिया है। रामनगर में अब तक कई क्विंटल सरकारी दाल गोदाम में डंप है। जबकि, हल्द्वानी में सैकड़ों सस्ते गल्ले की दुकानों में दाल डंप है। आदर्श राशनिंग डीलर्स वैलफेयर सोसायटी उत्तराखंड के पदाधिकारियों का कहना है कि वर्तमान में चीनी केवल केंद्र सरकार द्वारा अंत्योदय कार्ड धारक उपभोक्ताओं को ही दी जा रही है। जो कि प्रति माह एक किलो मिलती है। इसके अलावा बीपीएल, एपीएल कार्ड धारकों की चीनी काफी समय पहले बंद की जा चुकी है। उन्होंने कहा कि यदि दाल की जगह सरकारी दाम में चीनी सभी उपभोक्ताओं को मिले तो यह उपभोक्ताओं के हित में रहेगा।
यूपी से लेनी चाहिए सीख
प्रदेश अध्यक्ष आदर्श राशनिंग डीलर्स वैलफेयर सोसायटी उत्तराखंड रमेश चंद्र पांडेय ने कहा कि दालें गोदामों और सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों में डंप है। हर माह विक्रेताओं पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे दालें उठा लें। इससे बेहतर तो यह होता कि दाल की जगह उपभोक्ताओं को चीनी दी जाए। उत्तर प्रदेश में हाल ही में ऐसा किया गया है।












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