Brij Bhushan Singh: बृजभूषण सिंह के आगे असहाय क्यों नजर आ रही है भाजपा?

आखिर क्या कारण है महिला पहलवानों के गंभीर आरोपों के बाद भी भाजपा बृजभूषण शरण सिंह पर कोई दवाब नहीं बना पा रही है?

wrestlers protest Why is BJP no taking action against Brij Bhushan Singh

Brij Bhushan Singh: बाहुबली सांसद बृजभूषण शरण सिंह का आपराधिक ग्राफ तो बड़ा है ही, उनके अंदर संरक्षण देने वालों के खिलाफ गिरगिट जैसे रंग बदलने की फितरत भी आला दर्जे की रही है। हैंड ग्रेनेड के धुएं के साथ राजनीति में कदम बढ़ाने वाले बृजभूषण को गोंडा जिले के रसूखदार राजपूत लाटबख्श सिंह के परिवार ने आर्थिक मदद देकर आगे बढ़ाया, लेकिन आरोप यह भी है कि बृजभूषण ने मौका पाते ही परिवार के रविंदर सिंह की हत्या कर दी। हालाकि बृजभूषण सिंह ऑन कैमरा स्वीकार करते रहे हैं कि उन्होंने रविंदर सिंह की हत्या नहीं की बल्कि रविंदर को मारने वाले को खुद गोली मार दी थी। लेकिन रविंदर सिंह के भाई पूर्व मंत्री विनोद उर्फ पंडित सिंह अपने भाई की हत्या का आरोप बृजभूषण सिंह पर ही लगाते रहे हैं।

इसी तरह अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहिम के शूटरों को संरंक्षण देने, हथियार मुहैया कराने के आरोप में बृजभूषण सिंह को दोषी पाते हुए टाडा कानून के तहत तिहाड़ जेल में बंद कर दिया गया था। तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनकी मदद की थी। हौसला अफजाई करते हुए स्वातंत्र्य वीर सावरकर का उदाहरण देते हुए धैर्य रखने और जेल से शीघ्र रिहाई होने का पत्र भी लिखा था। इस कांड के कुछ छींटे कांग्रेस के दिग्गज नेता और मंत्री रहे कल्पनाथ राय पर भी पड़े थे। तब पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए कहा था कि कल्पनाथ राय पर लगाए गए आरोप बेबुनियाद है।

दोबारा प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद वाजपेयी जी ने इस मामले में बृजभूषण की मदद की थी। उसके ठीक बाद हुए लोकसभा के आम चुनाव में भाजपा ने गोंडा की सीट से घनश्याम शुक्ला को अपना उम्मीदवार बनाया था। यह बात बृजभूषण सिंह को अच्छी नहीं लगी। पार्टी को सबक सिखाने की खुन्नस में बृजभूषण सिंह ने भाजपा उम्मीदवार व वाजपेयी जी के रिश्तेदार घनश्याम शुक्ला को ही रास्ते से हटाने की साजिश कर डाली। मालूम हो कि चुनाव के दिन से पूर्व घनश्याम शुक्ला की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उनकी पत्नी नंदिता शुक्ला ने सड़क दुर्घटना को षड्यंत्र पूर्वक की गई हत्या बताया तथा बृजभूषण पर हत्या का आरोप लगाते हुए मामले की जांच की मांग की थी। बृजभूषण सिंह खुद भी स्वीकार करते हैं कि घटना के बाद पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी ने फोन कर शंका जताई थी कि "मैंने घनश्याम शुक्ला को मरवा दिया।"

रविंदर सिंह की हत्या के दशकों बाद उनके भाई पंडित सिंह से गिला शिकवा दूर कर साथ में व्यापार को आगे बढ़ाने का सिलसिला बृजभूषण ने फिर से शुरू किया। जब दुश्मनी की दरार लगभग पट रही थी उसी वक्त छोटी सी बात पर बृजभूषण ने फिर से रंग बदला और पंडित सिंह पर कातिलाना हमला करवा दिया। वह घटना बलीपुर कांड के नाम से तब अखबारों में सुर्खियां पायी थी। घायल पंडित सिंह को मुलायम सिंह यादव की निजी पहल पर हेलीकॉप्टर से इलाज के लिए बलीपुर से लखनऊ ले जाया गया था।

कई संगीन धाराओं समेत लगभग 3 दर्जन से अधिक आपराधिक मामलों में पंजीकृत बृजभूषण शरण सिंह के गुनाहों की फेहरिस्त लंबी है। वे आरंभ से ही हिंदुत्ववादी रामनामी ओढ़कर गुनाहों पर पर्दा डालने की कोशिश करते रहे हैं। लेकिन अवसर आने पर रंग बदलकर समाजवादी पार्टी व अन्य का भी दामन थामने में उन्होंने कभी संकोच नहीं किया।

50 से अधिक स्कूलों पर कब्जा कर देवीपाटन मंडल के शिक्षा माफिया के रूप में कुख्यात बृजभूषण सिंह ने गोंडा शहर के बीचो बीच 15 एकड़ में फैले शहीद भगत सिंह इंटर कॉलेज को भी पिस्टल पॉइंट पर हथियाने की कोशिश की थी। सोसाइटी के रजिस्ट्रार को अपने घर पर बैठाकर स्कूल की प्रबंध समिति की नियमावली में परिवर्तन करने का दबाव डाला था तथा पूरी की पूरी प्रबंध समिति को बदलने के लिए कहा था। ज्ञात हो कि प्रबंध समिति में एक नाम कुंडा के विधायक राजा भैया उर्फ रघुराज प्रताप सिंह का भी था। इसकी भनक जब राजा भैया को मिली तो उन्होंने कड़े शब्दों में विरोध किया तथा शहीद भगत सिंह इंटर कॉलेज से दूर रहने की हिदायत दी। बताते हैं कि बृजभूषण सिंह ने व्यक्तिगत रूप से राजा भैया से मिलकर सफाई दी और इस कार्यवाही के लिए रजिस्ट्रार सहित अन्य लोगों को दोषी बता दिया ।

यह तो कुछ उदाहरण मात्र है। छंटे हुए अपराधियों की तरह उनकी रंग बदलने की आदत पुरानी है। अब जबकि देश की नामी-गिरामी महिला पहलवान यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए दिल्ली के जंतर मंतर पर पिछले दो हफ्तों से धरना दे रही हैं तब भी बृजभूषण आरोपों को न सिर्फ नकार रहे हैं, बल्कि आए दिन अपने बयान भी बदल रहे हैं। जनवरी में जब पहलवानों ने आरोप लगाया था, तब वह कह रहे थे कि मेरे खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं है, अगर कोई मामला दर्ज होता है तो तुरंत पद छोड़ देंगे। जांच एजेंसियां जो भी सजा देंगी उसे स्वीकार करेंगे। 3 महीने बाद 23 अप्रैल को जब महिला पहलवान जंतर मंतर पर धरना देकर बैठ गई, तब अगले दिन उन्होंने मीडिया के सामने बयान दिया था कि प्रधानमंत्री या सरकार का कोई जिम्मेवार व्यक्ति निर्देश देता है तो वे तुरंत पद त्याग देंगे, क्योंकि उन्हें पद का मोह नहीं है।

अब वे फिर से रंग बदलने लगे हैं। पहलवानों को झूठा साबित करने, बचाव में शिलाजीत का सेवन नहीं करने के साथ-साथ ओलंपियन बजरंग पूनिया का विवादित ऑडियो जॉच कमेटी को सौंपने की बात दोहरा रहे हैं। ताल ठोक कर कह रहे हैं कि वह सभी पद चाहे सांसद का हो अथवा ओलंपिक संघ के अध्यक्ष का, चुनाव लड़ कर जीते हैं, किसी की कृपा से प्रसाद के रूप में नहीं पाए हैं। यानी कि जो बृजभूषण शरण सिंह कल तक प्रधानमंत्री के एक इशारे का इंतजार कर रहे थे अब क्षेत्र की जनता को ढाल बनाकर पेच और पैंतरा दोनों बदल रहे हैं।

ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि भारी कौन है? भारतीय जनता पार्टी अथवा अपराधिक पृष्ठभूमि वाला एक सांसद। फिलहाल पार्टी की चुप्पी से यह निष्कर्ष निकल रहा है कि पार्टी उन्नीस पड़ती जा रही है। एक समय था जब भाजपा ने पार्टी की अवहेलना के आरोप में इसी बृजभूषण को एक झटके में बाहर निकाल कर फेंक दिया था। तब वे गुस्से में 20 जुलाई 2008 को समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे। 2014 में आम चुनाव के पहले वे फिर भाजपा में शामिल हो गए।

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    अब सबकी नजरें केन्द्र सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदम की ओर लगी हैं कि वह इन फरियादी महिला पहलवानों की कब सुनती है? अठारहवी लोकसभा का चुनाव भी सिर पर हैं। राजनीतिक पंडित गिना रहे हैं कि सांसद बृजभूषण का असर गोंडा, बहराइच, कैसरगंज, बलरामपुर की सीटों पर अधिक है। अगर उन्हें हटाया जाता है तो इससे भाजपा को नुकसान होगा। लेकिन सवाल तो यह भी है अगर बृजभूषण सिंह भाजपा में बने रहते हैं तो देश प्रदेश में भाजपा की छवि का क्या होगा?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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