Israel and Palestine: भारत में क्यों हो रही है इजरायल फिलिस्तीन की जुबानी जंग?
Israel and Palestine: रविवार को गाजियाबाद के हिंडन एयरपोर्ट से भारतीय सेना के एक परिवहन विमान सी-17 ने मिस्र के लिए उड़ान भरी। इस विमान में कुल 38.5 टन राहत सामग्री एवं मेडिकल सहायता की चीजें थीं। ये राहत सामग्री गाजा पट्टी में बसे फिलिस्तीनियों के लिए भेजी गयी है जो मिस्र से गाजा पहुंचाई जाएगी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा, 'भारत ने फिलस्तीन के लोगों को मानवीय सहायता भेजी है। इसमें लगभग 6.5 टन चिकित्सा सामग्री और 32 टन आपदा राहत सामग्री है।'
संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आव्हान पर दुनियाभर के देश फिलिस्तीनी नागरिकों की मदद के लिए आगे आ रहे हैं। इसमें अब भारत ने मदद का हाथ आगे बढाया है। लेकिन दुर्भाग्य से भारत सरकार की ओर से फिलिस्तनियों के लिए भेजी गयी इस राहत की भारतीय मीडिया में ही कोई खास चर्चा नहीं हुई। इसके उलट जब प्रधानमंत्री मोदी ने हमास के आतंकवाद का शिकार हुए इजराइलियों के लिए सहानुभूति के दो शब्द बोल दिये तो हंगामा हो गया था।

इजरायल पर हमास के आतंकी हमले के बाद से ही भारत सरकार का दृष्टिकोण तुष्टीकरण की बजाय मानवीय है। अगर वर्तमान मोदी सरकार ने इजरायल पर हुए हमास के आतंकी हमले की निंदा की तो हिंसा पीड़ित फिलस्तीनियों के लिए भी मदद का हाथ आगे बढाया है। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने फिलस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास से भी फोन पर बात की थी। महमूद अब्बास से पीएम मोदी ने इजरायल फिलस्तीन पर भारत के पुराने रुख को दोहराते हुए कहा था कि "उस क्षेत्र में हिंसा, आतंकवाद और बढती सुरक्षा चुनौतियों के प्रति हम सचेत हैं।" इसके अलावा मोदी ने उन्हें इजरायल फिलिस्तीन को लेकर भारत के पुराने रुख के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई।
स्वाभाविक है राजनयिक रूप से भारत इजरायल फिलिस्तीन संबंधों को लेकर अपनी कटस्थ नीति पर ही कायम है। हां, पीएम मोदी ने इजरायल के संबंधों में नयी ताजगी पैदा की है। इजरायल भारत के साथ जटिल सुरक्षा उपायों में मददगार रहा है। खासकर मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद इजरायल और भारत के संबंधों में करीबी आयी है क्योंकि वहां हिन्दू और यहूदी दोनों एक साथ इस्लामिक आतंकवाद का शिकार हुए थे। आतंकवाद दोनों की साझी पीड़ा है जिसके कारण दोनों का एक साथ खड़ा होना जरूरी भी है और मजबूरी भी।
लेकिन राजनयिक संबंधों के इतर राजनीतिक दलों और सोशल मीडिया पर इजरायल फिलिस्तीन का बंटवारा भी भारत में गहरा हो चला है। राजनीति और सोशल मीडिया पर भी एक बड़ा वर्ग ऐसा पैदा हो गया है जो खुलकर इजरायल का समर्थन करता है। 7 अक्टूबर की सुबह जब हमास के हमलावरों ने इजरायल के निर्दोष नागरिकों को अपना निशाना बनाया था उसके बाद से ही सोशल मीडिया पर आई स्टैंड विद इजरायल का हैशटैग चल पड़ा था जो कई दिन तक चलता रहा।
सोशल मीडिया पर भारत से इजरायल के नागरिकों के पक्ष में इतनी तगड़ी आवाज उठी कि इजरायल के राजदूत ने पीड़ा की इस घड़ी में उनके साथ खड़े होने के लिए धन्यवाद भी दिया। इजरायल के विदेश मामलों के प्रभारी मंत्री एमिकाई चिकली ने भी सोशल मीडिया पर मिले भारतीयों के समर्थन पर धन्यवाद दिया और कहा कि "इस्लामिक जिहादी आतंकवाद के खिलाफ हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने के लिए हम भारत सरकार और भारतीय नागरिकों का धन्यवाद करते हैं।"
भारत में ऐसा पहली बार हुआ कि सोशल मीडिया पर इजरायल के आतंक पीड़ित नागरिकों के पक्ष में ऐसी आवाज सुनाई दी। भारत में लंबे समय तक कांग्रेस का शासन रहा और बौद्धिक जगत में वामपंथी ही प्रभावी होते थे। राजनीतिक रूप से कांग्रेस के लिए यह कभी फायदेमंद नहीं था कि वह यहूदी इजराइलियों के साथ खड़ी दिखाई दे क्योंकि इससे उसका मुस्लिम वोटबैंक प्रभावित होता था। बौद्धिक जगत में जेएनयू जैसे शिक्षण संस्थानों में हमेशा फिलिस्तीन को पीड़ित और इजरायल को शोषक के रूप में प्रस्तुत किया था। जो पोस्टर, बैनर, रैली या मार्च होते थे वो इजरायल डाउन डाउन के नारे के साथ ही होते थे।
जहां तक भारत के मुसलमानों का सवाल है तो वह बिला शक इजरायल के खिलाफ ही रहेगा क्योंकि उनकी मजहबी किताबों में उनको ऐसा करने के लिए कहा गया है। वो फिलस्तीनी मुसलमान को अपना भाई मानें न मानें, यहूदी को कसाई जरूर मानेंगे। इसलिए जब जब इजरायल और फिलस्तीन में टकराव होता था तो भारतीय मुस्लिम इजरायल को लानते भेजने, उनके खिलाफ रैलियां करके अपनी एकजुटता दिखाने का काम करते आये हैं।
इस बार भी अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी से लेकर हैदराबाद तक इजरायल के खिलाफ जहर उगलने से मुस्लिम पीछे नहीं हटे। हैदराबाद की एक मस्जिद के बाहर तो जमीन पर इजरायल और अमेरिका का झंडा बनाया गया था ताकि वो उस पर पैर रखकर मस्जिद के अंदर बाहर आएं जाएं। इसी तरह केरल की एक कंपनी मरियम अपारेल ने इजरायल के पुलिसवालों के लिए ड्रेस सप्लाई इसलिए रोक दी क्योंकि वह चाहती है कि इजरायल फिलीस्तिनियों पर हमले बंद करे। यह कंपनी एक क्रिश्चियन थॉमस ओलिक्कल की है। उनका कहना है कि वो दोनों ओर से होनेवाले खून खराबे के प्रति अपना विरोध दर्ज कराना चाहते हैं।
इसी तरह राजनीतिक दलों में भी इजरायल फिलिस्तीन का बंटवारा दिखता है। फिलिस्तीन के समर्थन में कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित किया, वहीं पूर्व कांग्रेसी शरद पवार ने कहा कि इजरायल बाहरी है जिसने फिलिस्तीन पर कब्जा कर लिया है। इसीलिए जवाहरलाल नेहरु से लेकर वाजपेयी तक हर प्रधानमंत्री ने फिलस्तीन का समर्थन किया था। लेकिन लगता है पीएम मोदी ने भारत का स्टैंड बदल दिया है। हालांकि उनके बयान पर बहुत राजनीतिक विवाद हुआ और भाजपा ने उन्हें याद दिलाया कि पीएम मोदी ने इजरायल पर हमास के आकंकवादी हमले की निंदा किया है, तो क्या पवार आतंकवादी हमलों को भी सही मानते हैं।
असम के बीजेपी मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वसरमा तो दो कदम और आगे बढ गये। उन्होंने कहा कि पवार साहब को फिलिस्तिनियों से इतनी हमदर्दी है तो अपनी बेटी को उनकी मदद के लिए भेज दें। शरद पवार के बयान की आलोचना हुई तो हेमंत विस्वसरमा के बयान की भी निंदा हुई। इस बीच 21 अक्टूबर को श्रीनगर में मुसलमानों ने इजरायल के विरोध और फिलस्तीनियों के समर्थन में एक रैली ही निकाल दी। उन्होंने फिलस्तीन पर इजराइली कार्रवाई की तो खूब आलोचना की लेकिन इजरायल पर हमास के आतंकी हमले पर एक शब्द नहीं बोला।
स्वाभाविक है आज के भारत में अब फिलस्तीन के मुखर समर्थक हैं तो इजरायल के भी समर्थक हैं जो उसके साथ खड़े होने में कोई संकोच नहीं करते। हालांकि ऐसे लोगों के लिए कोई मजहबी मजबूरी नहीं है कि वो इजरायल का समर्थन करें जैसे मुस्लिम मजहब के नाम पर फिलिस्तीन का समर्थन करते हैं। लेकिन संभवत: इस्लामिक आतंकवाद ने ऐसे लोगों के मन में यहूदियों के लिए सहानुभूति पैदा कर दी है।
भारत एक लोकतंत्र है और कोई किसी का समर्थन या विरोध कर सकता है। सबको अभिव्यक्ति की आजादी है। लेकिन व्यावहारिक रूप से देखें तो एक भारतीय के रूप में हमारे लिए यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि फिलिस्तीन इजरायल की जुबानी जंग भारत में लड़ें। विदेशी मामले सरकार की विदेश नीति का हिस्सा होते हैं और यह काम उन्हीं को करने देना चाहिए। लेकिन जब आप भारत जैसे उदार लोकतंत्र में हों और आपके पास अभिव्यक्ति के लिए विचार ही नहीं प्लेटफॉर्म भी हो तो फिर आपको अपनी अभिव्यक्ति से कौन रोक सकता है?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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