Mulayam Singh Yadav: मरणोपरांत मुलायम सिंह को पद्मविभूषण देने से भाजपा को क्या हासिल होगा?
मुलायम सिंह को मरणोपरांत पद्मविभूषण देने की घोषणा करके केन्द्र की मोदी सरकार ने सबको चौंका दिया। क्या ऐसा करते हुए निजी संबंधों का ध्यान रखा या इसके राजनीतिक उद्देश्य हैं? इससे भाजपा को राजनीतिक लाभ होगा या नुकसान?

Mulayam Singh Yadav: पद्म पुरस्कारों को लेकर एक सामान्य धारणा है कि सत्ताधारी दल अपने वैचारिक सहयोगियों एवं समर्थकों को इन पुरस्कारों से सम्मानित करता है, लेकिन अपने कट्टर विरोधी को भी पुरस्कार देकर राजनीति साधी जा सकती है, ऐसा पहली बार होता दिख रहा है। भारत की सियासत में पिछले नौ सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह अपने फैसलों से समर्थकों एवं विरोधियों दोनों को चौंकाते आ रहे हैं, लेकिन इस बार के एक फैसले से लोग हक्के बक्के हैं।
केंद्र सरकार के इस फैसले से एक बड़ा वर्ग सकते में है, खासकर उत्तर प्रदेश में भाजपा को समर्थन देने वाली एक बड़ी आबादी। वोट बैंक की सियासत को साधने के लिये केंद्र सरकार ने कर्नाटक के पूर्व सीएम एसएम कृष्णा, त्रिपुरा के आईपीएफटी नेता एनसी देबबर्मा के साथ अयोध्या में रामभक्तों पर गोली चलवाने वाले मुलायम सिंह यादव को मरणोपरांत भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण देकर तमाम सियासी जानकारों को अचंभे में डाल दिया है।
कर्नाटक में कांग्रेस नेता एवं पूर्व सीएम एसएम कृष्णा को पद्म विभूषण दिया जाना चौंकाने वाला नहीं है, उन्हें वोट बैंक की राजनीति को ध्यान में रखकर पुरस्कार दिया गया है। एसएम कृष्णा भाजपा में शामिल हो चुके हैं और राज्य की वोक्कालिगा जाति के मजबूत नेता हैं। एचडी देवगौड़ा के बाद इस जाति पर एसएम कृष्णा की मजबूत पकड़ मानी जाती है। 2023 कर्नाटक विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कृष्णा को पद्म विभूषण देना वोक्कालिगा समुदाय को साधने की कोशिश मानी जा रही है।
इसी तरह त्रिपुरा विधानसभा चुनाव को देखते हुए आईपीएफटी के नेता एनसी देबबर्मा को भी पद्म विभूषण देकर भाजपा के नजदीक लाने की कोशिश की गई है। 2018 में भाजपा ने एनसी देबबर्मा के सहयोग से ही त्रिपुरा में अपनी पहली सरकार बनाई थी, लेकिन पिछले कुछ समय से दोनों दलों के रिश्तों में खटास आती जा रही थी। पद्म विभूषण के जरिये भाजपा ने एक बार फिर एनसी देबबर्मा से अपने गिले-शिकवे दूर करने का प्रयास किया है।
परंतु, इन दोनों से इतर मुलायम सिंह यादव को पद्म विभूषण दिये जाने से यूपी का भाजपाई वोटर खुश नहीं है। केंद्र का यह फैसला बहुतों के गले नहीं उतर रहा है। वह भी तब जब मुलायम सिंह यादव पर यूपी के मुख्यमंत्री रहते रामभक्त कारसेवकों एवं उत्तरांखड आंदोलनकारियों पर गोली चलवाने का आरोप चस्पा है और भाजपा की हिंदुवादी राजनीति के उलट कट्टर मुस्लिम तुष्टिकरण में मुल्ला मुलायम सिंह बन जाने की सियासी पहचान दर्ज है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपराध एवं अपराधियों के महिमामंडन का आरोप भी मुलायम सिंह यादव की सियासत को जाता है। उत्तर प्रदेश में राजनीति के अपराधीकरण के इतिहास की जब भी बात होगी, मुलायम सिंह यादव का जिक्र किये बिना कोई भी अध्याय पूरा नहीं होगा। सत्ता के लिये अपराधियों को राजनीतिक मान्यता दिलाने की बात जब भी होगी तब बिहार में लालू यादव एवं यूपी में मुलायम सिंह यादव के नाम की चर्चा के बगैर चर्चा अधूरा ही रहेगी।
अतीक अंसारी, मुख्तार अंसारी, अफजाल अंसारी, डीपी यादव, रमाकांत यादव, अभय सिंह, भगवान पंडित, मित्रसेन यादव जैसे बाहुबलियों को राजनीतिक प्रश्रय देकर पुलिस के मनोबल को तोड़ने की बात जब भी उठेगी, मुलायम सिंह यादव की माफियापरस्त राजनीति की बात जरूर होगी। वोट के लिए अपराधियों को सियासी खुदा बनाने की चर्चा जब भी होगी, मुलायम राज में डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह के इस्तीफे की चर्चा के बिना यह कभी पूरी नहीं होगी।
भाजपा के कट्टर विरोधी एवं तुष्टिकरण की राजनीति के पुरोधा मुलायम सिंह यादव को पद्म विभूषण देकर मोदी सरकार को लगता है कि यादव वोटरों का झुकाव उनकी पार्टी की तरफ हो जायेगा तो यह राजनीतिक नासमझी से ज्यादा कुछ नहीं है। हाल ही में मैनपुरी चुनाव में भाजपा अपनी इस रणनीति का हश्र देख चुकी है। मुलायम के निधन के बाद उनको एक कल्ट फिगर बना देने की भाजपाई रणनीति मैनपुरी उपचुनाव में भारी पड़ चुकी है।
2019 के लोकसभा चुनाव में जिस मुलायम सिंह यादव को सपा-बसपा गठबंधन से लड़कर एक लाख से भी कम वोटों से जीत मिली थी, उसी मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद उन्हें महामानव बना देने पर उनकी बहू डिम्पल यादव ने केवल सपा के बैनर तले लड़कर भाजपा को ढाई लाख से ज्यादा वोटों से धूल चटा दी। जातीय राजनीति के पुरोधा मुलायम को पद्म विभूषण देकर भाजपा नेतृत्व को लगता है कि यादव वोट उनकी झोली में गिरने लगेंगे तो उसे अपने सांसद हरनाथ सिंह यादव के बूथ का आंकड़ा एक बार खंगाल लेना चाहिए।
हरनाथ सिंह यादव से पहले भाजपा ने अशोक यादव को सपा-मुलायम के समानांतर यादव नेता बनाने की कोशिश की, लेकिन अशोक यादव पार्टी पर ही भार बन गये। भाजपा ने हरनाथ सिंह यादव को राज्यसभा सांसद बनाया, सुभाष यदुवंश को एमएलसी बनाया, लेकिन नतीजा शून्य है। ये अपने बूथों पर भी भाजपा को अपनी बदौलत जीत दिला पाने की हैसियत में नहीं हैं, क्योंकि यादवों के लिये नेता का मतलब मुलायम-अखिलेश और पार्टी का मतलब केवल समाजवादी पार्टी है।
सपा से अलग होकर भाजपा से गलबहियां करने वाले शिवपाल सिंह यादव इस मानसिकता के सबसे बड़े उदाहरण हैं। शिवपाल के लिये जब तक सपा में जगह नहीं थी, वह भाजपा के साथ दोस्ताना राजनीति करते रहे। बदले में भाजपा सरकार ने भी शिवपाल को शानदार कार्यालय से लेकर सुरक्षा तक प्रदान की। शिवपाल भी अखिलेश एंड कंपनी को बर्बाद करने तथा सपा के साथ कभी नहीं जाने की कसमें खाते रहे।
लेकिन मैनपुरी उपचुनाव में जैसे ही अखिलेश ने शिवपाल को तवज्जो दी, वह भाजपा के खिलाफ 360 डिग्री पर घूम गये। भाजपा को यूपी से खत्म करने का ऐलान करने लगे। दरअसल, यही यादव वोट बैंक की मानसिकता है। यूपी में उसके लिये समाजवादी पार्टी के अलावा दूसरा कोई भी विकल्प नहीं है। भाजपा मुलायम सिंह यादव जैसे जातिवादी एवं मुस्लिमपरस्त राजनीतिज्ञ को महामानव बनाने में जुटी रही तो गैर-यादव पिछड़ा भी हाथों से छिटक जायेगा, जिसकी कोशिश अखिलेश शुरू कर चुके हैं।
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हालांकि राजनीतिक गलियारों में चर्चा ये भी है कि मुलायम सिंह यादव को मरणोपरांत पद्मविभूषण देने की घोषणा करके प्रधानमंत्री मोदी ने निजी संबंधों को निभाया है। वो व्यक्तिगत रूप से मुलायम को महत्व देते थे और मुलायम सिंह यादव भी भरी संसद में मोदी की प्रशंसा कर चुके थे। लेकिन इन व्यक्तिगत संबंधों से इतर भाजपा मुलायम को जितना महान बनाने की कोशिश करेगी, उसके अपने वोटर तो नाराज होंगे ही, सपा के पक्ष में यादव वोटबैंक भी उतनी ही मजबूती से लामबंद होता जाएगा। यही यूपी की राजनीतिक सच्चाई है।
यह भी पढ़ें: Bharat Ratna Award: Mulayam Singh को "भारत रत्न" दिए जाने के पीछे क्या है Samajwadi Party की सियासत
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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